ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 7

 मैं जब घर आई तो मेरे पास ढंग की रहने या पढ़ने-लिखने की जगह नहीं थी। इतने सालों खुले और ठीक-ठाक से (युनिवेर्सिटी) घरों में रहकर, एक कमरे या एक छोटे-से मकान में सिमट जाना, घुटन जैसा-सा था। अब अपना घर है और बचपन वहाँ बिता है, तो आदत तो वक़्त के साथ पड़ जाएगी। मगर, अब आप वहाँ रहोगे क्यों? किसलिए? होना तो ये चाहिए की माँ को भी वहाँ से अपने साथ कहीं ढंग की जगह ले जाओ। भाईयों को भी किसी ढंग के काम लगाओ। मगर आप जो सोचते हैं, जरुरी नहीं वो किसी आसपास को या वहाँ की राजनीती को भी सूट कर रहा हो। हुआ भी वही। जो कुछ करने की सोचो, उसी में आगे से आगे रोड़े। वो भी अपनों या आसपास द्वारा ही? या ये सब भी कहीं और से ही रिमोट कण्ट्रोल हो रहे हैं? मानव रोबॉटिकरण, यही सब देख, सुन और समझकर, पता चलने लगा था। आम लोगों में खोट नहीं है। गाँव का या कम पढ़ालिखा या आज की टेक्नोलॉजी के प्रयोग और दुरुपयोग से अंजान इंसान, आज भी पढ़े लिखे और कढ़े शिकारियों से कहीं ज्यादा भोला है। ये तो Conflict of Interest की राजनीती की पैदा की, चारों तरफ चोट हैं। ऐसे भी और वैसे भी। 

मुझे कम जगह में या भीड़-भाड़ वाली जगह रहना पसंद ही नहीं। तो सबसे पहले गाँव से थोड़ा दूर जो ज़मीन है, वहाँ एक रुम सैट बनाने का इरादा था। मगर, वो सबने घर पर ये कहकर मना कर दिया, की रहने के लिए सुरक्षित जगह नहीं है। ये स्कूल के साथ वाली ज़मीन पर बनाने का प्लॉन भी, यहीं घर से निकल कर आया था। क्यूँकि, मुझे किसी स्कूल जैसी जगह के इतने पास रहना भी पसंद नहीं। शोर और कुछ भीड़ तो वहाँ भी होगी। खैर। कई और सहुलियत हैं, जो उस ज़मीन को ज्यादा सही बता रही थी। वहाँ पानी मीठा है, जो यहाँ के गाँवों की खास दिक्कत है। और इसीलिए ऐसी ज़मीनो के रेट भी ज्यादा हैं। गाँव के बिल्कुल साथ लगती है। आसपास घर बन चुके हैं। स्कूल तो है ही। हाईवे पर नहीं है। तो रहने के हिसाब से ज्यादा सही है। आसपास चारों तरफ खेत हैं, जिन्हें खुला पसंद है। लो जी, वहाँ की हाँ क्या की, आदमखोरों के जाले फ़ैल गए। उसके बाद तो जो कुछ हुआ, पीछे पोस्ट्स में लिखा ही जा चुका। 

स्कूल वालों को क्या दिक्कत थी की वहाँ कुछ ऐसा ना बनने दें? भाभी स्कूल का प्लान बना चुके थे। अब जो स्कूल को बिज़नेस बोलते हैं और बिज़नेस की ही तरह चलाते हैं, उनके धंधे पर असर नहीं पड़ेगा? और वो तो पिछले 20-22 सालों में कितनी ही बार वो ज़मीन माँग चुके थे। और हर बार उन्हें मना किया जा चुका था। अब कोई उस ज़मीन पर अपना कुछ बनाने की भी सोचे, इतना बर्दास्त कैसे हो? नहीं तो चाचा, ताऊओं का होना तो ये चाहिए, की तुम भी बसो और आगे बढ़ो? आजकल ऐसे चाचे-ताऊ कहाँ हैं? होंगे कहीं, मगर यहाँ? यहाँ तो कुछ और ही कहानी कह रहे हैं। वो भी बड़ी ही बेशर्मी से। एक दिन जुबाँ ऐसे चलेगी और अगले दिन कुछ और ही रचते नज़र आएँगे? कर दो साफ़ तीनों को और सिर्फ यही ज़मीन क्यों, बाकी सब भी तुम्हारा। लड़की का क्या है, वो तो वैसे भी किसी और घर जाती हैं। उनके अपने घर कहाँ होते हैं? कहीं भी नहीं। 

अब मुझे तो वहीँ बनाना है, चाहे रहना कहीं भी हो। देखते हैं आगे-आगे, की ये लालची और हरामी भतीजा और इसके पीछे वाली सुरँगे और क्या-क्या रचती हैं? सुन बेटे, सबके बीच सुन, तूने धोखाधड़ी से उस ज़मीन पर अपना नाम भी लिखा लिया हो (खास वाली फोटो खिंचा ली हो), तो भी वो तेरी नहीं। 

Clickbait Business? हाँ, यही हाल रहे तो जेल तेरी और तेरे साथ-साथ, ये सब रचने वालों की जरुर होगी। कोर्ट क्या कहते हैं, वैसे इसमें? उनके पास तो आजकल सब सबूत होते हैं।     

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 6

 घरों से प्लॉट की तरफ, वहाँ पे लेट (तालाब) की ज़मीन, आसपास लगते लोगों द्वारा हड़पने की कहानी और यूक्रेन युद्ध? अज़ीब किस्से-कहानी हैं ना? और उससे भी ज्यादा अज़ीब, संसार के किसी और कौने में, ऐसे-ऐसे युद्धों की सामान्तर घढ़ाईयाँ?   

यहाँ चाचा के लड़के का अहम रोल रहा? या जो राजनीतिक सुरँगे, उससे वो सब करवा रही थी, उनका? शायद दोनों का ही? ये मोहरा? और वो अहम खिलाड़ी? जो दूर, बहुत दूर बैठे, किसी रिमोट-सा सब संभाल लेते हैं? और ये सब करने के लिए उसे पैसे देने वाले का?   

अगर कोई इंसान ये कहे, की मैं कुछ भी करुँ, मुझे मेरे घर वाले बचा लेंगे या फिर भी हमेशा साथ रहेंगे, तो गड़बड़ उस घर में या उन अपनों में भी है? या शायद, वो ऐसी हेकड़ी, सिर्फ खुद को बचाने के लिए कर रहा है? या शायद उस जगह का या ऐसी-ऐसी जगहों के माहौल ही ऐसे होते हैं? उन्हें ना खुद अपनी काबिलियत पता होती और ना उन्हें बताने वाले? उन्हें ऐसे रस्ते ही नहीं दिखाए जाते, जहाँ जितनी मेहनत ऐसे-ऐसे तिकड़म कर कुछ हड़पने की बजाय, शांति और ईमानदारी से कमाने में मिलता है? सिर्फ राजनीतिक पार्टियाँ या उनकी सुरँगे ही नहीं, बल्की, खुद अपने, कहीं न कहीं, गलत करने की तरफ धकेलने में सहायक-सी भुमिका निभा रहे होते हैं? अब वो छोटा-मोटा कुछ गलत करने से नहीं रोक रहे या उसमें सहायक बन रहे हैं, तो आगे जब वो बड़ा कुछ गलत करेगा, तब रोकेंगे क्या? या चाहकर भी रोक पाएँगे?

अब प्लॉट की ज़मीन आगे बढ़ाई है, रेत डाल-डाल कर। उसमें कुछ तो पैसे लगे ही होंगे? और थोड़ा-बहुत रिस्क और उलझन भी उठाई है? तो वो पैसे निकलेँगे कैसे और कहाँ से? ये बताने का काम भी राजनीतिक पार्टीयों की सुरँगे ही करेंगी? वो आपको आगे से आगे, छोटे-मोटे लालच देते चलते हैं? और आप लेते चलते हैं? बिना दूरगामी परिणाम जाने या समझे? खेल तो सब वही राजनीतिक पार्टियाँ और उनकी सुरँगे रच रही हैं ना? फाइल यूनिवर्सिटी में चलती हैं और ज्यादा बड़ी मार के लिए, सामान्तर घढ़ाईयाँ बढे-चढ़े रुप में, गाँवों में या ऐसी सी जगहों पर घड़ी जाती हैं? कुछ गलत तो नहीं कहा? या सब मैच कर रहा है? कब यूनिवर्सिटी में क्या हुआ या कैसी फाइल चली या ऑफिसियल ईमेल और कब गाँव में क्या कुछ घड़ा गया? इन कम पढ़े-लिखे बेरोजगारों को तो ऐसा कुछ अंदाजा तक नहीं होगा? खुद मुझे ही नहीं पता था। जब तक ये सब गाँव आकर आसपास देखना, समझना और झेलना शुरु नहीं किया।  

पहले यहाँ बच्चों के या युवाओं के ख़िलाफ़ जितने भी केस हुए, वो भी ऐसे ही हैं? अब ज्यादा पहले की फाइल्स का रिकॉर्ड तो मेरे पास नहीं, क्यूँकि, तब तक खुद मुझे नहीं मालूम था की ये सिस्टम और राजनीती काम कैसे कर रहे हैं? या आम लोगों की ज़िंदगियों को कैसे-कैसे प्रभावित कर रहे है? हाँ। जो कुछ चल रहा था, उसके किसी न किसी रुप में ऑफिसियल रिकॉर्ड हैं। और वो बड़ी आसानी-से मैच किए जा सकते हैं? 

अब पैसे उघाने हैं और उसी में थोड़े-बहुत कमाने को भी मिल जाएँगे? तो उन्हीं राजनितिक सुरँगों का अगला दाँव? स्कूल पे पास वाली खेत की ज़मीन? उसके लिए फिर से उनके काम कौन आएगा? सोचो? 

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 5

 यूक्रेन युद्ध शुरु हौगा।  

बला, माँ-बेटी मैं कीमे छोटी-मोटी कहा सुणी तै ना हो री?

बेटी का सामान आ गया, वो कोई घर खाली कर रही थी यूनिवर्सिटी में शायद, और इस माँ के छोटे-से घर पर इतना सामान रखने की जगह नहीं।  

ले भाई, वो अंडी नै फेसबुक पै झंडा गाड दिया। 

अच्छा। ले हाम नै भी गाड दिया, महारे प्लॉट मैं। 

यो के सौदा भाई?

दे ट्रकां, दे ट्रकां, या लेट भी आंट दी एक अ रात मैं। जै दूसरी गली कन्हाँ, दूसरा गेट ना काढ़ दिया, तै हाम भी साँ ए ना। 

दूसरी गली कन्हाँ?

हाँ। महारे सरपँच की गली। 

महारे या महारी सरपँच की?

हाँ। हाँ। गामां मैं एक अ बात होया करै। 

अच्छा? आदमी-औरत एक? 

छोड़।    

खोपरो, यो के साँग मचा राख्या सै? या पंचायती ज़मीन क्यों हड़पण लाग रे सो?

पंचायती? हाम तै नू सुणी सै अक इसके साथ जिस-जिस की ज़मीन लागै सै, उनकी सबकी सै। अर गाम का गन्दा पानी, सारा चलता कर राख्या सै ईहमैं। सुना सै, सफाई होवै सै या तै आसपास की। अर पंचायती? माहरे सरपंच कै एक कमरा-सा बताया कैदे आडै-सी, उह तै आगे सारी याहे पंचायती हड़प रहा सै अंडी। आज घर देखा सै उहका? कीत तहि पहुँच रहा सै?   

तू पंचायत की बात करै ,आङे आपनै MLA, Ex MLA, गाँव मैं सबतै घणी ज़मीन के मालक बतानियें, बेरा ना कीत-कीत की ज़मीना पै, दादागिरी मैं आपणे नाम कराएँ हॉन्डें सैं। 

और लो जी, सुना, उसी दिन कोई पुलिस भी आ गई वहाँ, ये देखने की पंचायती ज़मीन पै साँग माच रहा सै। सुना, किसे MLA नै ए भिझवाई। मगर आई और गई। अब कोई कहे, पहले सरपंच या MLA को पकड़ो, या इनकी हड़पी हुई खाली करवाओ। तो पुलिस भी आपणा-सा मुँह लेकै ए चालती बनती होगी? खैर, सुनी-सुनाई बातें, इधर-उधर की।   

बेरा ए ना, कित सो ना धर राख्या सै, अर कीत सोनी आ? कीत सोना लीका अर कित, किसे-किसे राम या बलवान धरे सैं। भुण्डा साँग सै। इस पंचायत की तरफ ये, तो उस  पंचायत की तरफ किमैं और। पंचायत या म्युनिसिपलिटी बदली, अर, उडे की ज़मीना की कहानी भी।      

ये साँग कई दिन चला। सुना यूक्रेन युद्ध चल रहा था कोई। कहीं झंडा सिर्फ फेसबुक पर गड रहा था, तो कहीं? किसी ज़मीन पर?

बस इतना-सा ही फर्क है, की कहीं सिर्फ फाइलें चलती हैं। ज्यादा हो जाए, तो कोर्ट केस। 

अमिर हों तो, सब उनके वकील निपटते हैं। साहब लोग सिर्फ उन्हें पैसे देते हैं। कोर्ट में शायद ही कभी दिखते हैं। गरीबों के पास ऐसी कोई सुविधा नहीं होती। हकीकत ये होती है, की गरीब होने का मतलब ही अक्सर हार होता है? उन्हें पता ही नहीं होता, की उनके केस में चल क्या रहा होता है। जब पता चलता है, तो साहब लोग बहुत कुछ निपटा चुके होते हैं। वकील इधर का हो या उधर का, अक्सर होता इन साहब लोगों का ही है। अक्सर। तो इतना पता होते हुए, पंचायती जैसी ज़मीनों के लिए, कौन कोर्टों की तरफ देखता होगा? थोड़े बहुत पुलिस ड्रामे के बाद, सब रफ़ा-दफा हो जाता है। 

तो पुलिस आई-गई हुई? थोड़े ड्रावे के बाद? उसके बाद, आपस में मिलबैठकर खाने की बातें होती हैं। पता ही नहीं,  आधी से ज्यादा लेट पर किस, किस ने रेत डलवा दिया था, एक-दो दिन के अंदर ही। मेरे लिए इस तरह का कोई ड्रामा, यूँ आँखों के सामने होते देखना, पहली बार था। चाचा का लड़का इस सबमें फ्रंट पर था। अब पैसे तो घर से ही लिए होंगे? सुना है, इतने पैसे उसके पास नहीं होते। कभी-कभार पीने वाले भाई को भी उसने चढ़ाया हुआ था। ले, तेरी ज़मीन भी बढ़ा दी। उसकी तरफ की पीछे वाली ज़मीन पर भी रेत डलवा थी। मगर इसके आगे तो कुछ और ही साँग था। यहाँ लेट की ज़मीन से, वहाँ खेत की ज़मीन की तरफ बढ़ते ज़मीनखोर। 

मैंने एक-दो बार कहा भी, की ये क्या कर रहे हो तुम? 

दुनियाँ ने किया हुआ है, तो हमने क्या अलग कर दिया? 

दुनियाँ गोबर खाएगी, तू भी खाएगा?

और छोटू फिर गुल था। कई बार सुन चूका था, तो अब बात भी कम होने लगी थी। 

चलो, ये तो कम पढ़े-लिखे, बेरोजगार, ज्यादातर गाँव में रहने वाले हैं। ये so-called ऑफिसर, फेसबुक पर कौन-से और कैसे झंडे गाड़ रहा था? वही भारत माता की जय वाले? या किसी युद्ध वाले? ये यूक्रेन युद्ध का रोहतक के मदीना या सोनीपत के लोगों से क्या लेना-देना? ये तो पागलपन का ही दौरा हो सकता है? मगर किसे? यहाँ जो कुछ कर रहे थे, उन्हें? या उनसे जो करवा रहे थे, उन्हें? सुरँगे, राजनीतिक पार्टियों की? राजनीती कम पढ़े-लिखे और बेरोजगार लोगों को अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए कैसे-कैसे दुरुपयोग करती है?

या फिर ये पागलपन का दौरा, उन न्यूज़ चैनल्स को पड़ गया था, जो खामखाँ में गला फाड़-फाड़कर, यूक्रेन युद्ध, युद्ध चिला रहे थे? कहीं पुराने विडियो चेप रहे थे, तो कहीं AC वाले न्यूज़ स्टुडिओं में बैठकर फर्जी विडियो बनाकर, उनमें स्पेशल भड़ाम-भड़ाम वाले इफेक्ट्स डाल रहे थे? 

फिर तो यूक्रेन में भी कुछ तो हुआ ही होगा? कोई युद्ध? उसकी मार झेलने वाले लोग? कहीं कुछ मरे भी होंगे? तो कितने ही विस्थापित भी हुए होंगे? घर, बेघर जैसे?

कहीं किसी के पास बार-बार, घर खाली करो के, कोई GB (General Branch), MDU ईमेल भी भेझ रही होगी? तो कहीं, किसी अड़ोसी-पड़ोसी ससुराल से घर बैठी लड़की से भी कुछ ऐसा कहलवा रहे होंगे, मेरा घर खाली करो? चाहे उसकी क्वालिफिकेशन तक उस नौकरी के आसपास ना हों? मगर कैसे? ये अहम प्र्शन है। जितना इसे समझोगे, उतना ही Conflict of Interest की राजनीती के जालों से बच पाओगे।  

Emotional Fooling? with personal effects? 

आपको बताया या समझाया गया है, की आपके साथ ऐसा होने की वजह फलाना-धमकाना है। चाहे आपके और उसके रिश्ते में वैसा कुछ भी ना हो। वो आपके ससुराल को तो छोड़ो, पति तक को ना जानती हो। जो कहानी उनके बारे में, वो यहाँ-वहाँ आप लोगों से ही अब गाँव आने के बाद सुन रही है। वो ऐसे-ऐसे लफंडरों, गँवारों, जाहिलों या लालची लोगों को पसंद तक ना करती हो। कहाँ एक इंडिपेंडेंट इंसान और कहाँ ये गाँवों के सास-बहु के जैसे, एकता कपूर के सीरियल?  

Twisting and Manipulating Facts? 

आप यही भूल जाएँ की आप कौन हैं? और सामने वाला या वाली कौन? और उससे आपका रिश्ता क्या है? या जिनसे आप जोड़ रहे हैं, अपने भर्मित दिमाग के जालों में, उनमें और इसकी समस्याओं में फर्क क्या है? 

जैसे कोई कहदे की आप मोदी हैं। हो सकता है आपका नाम मोदी हो। मगर, आप भारत के प्रधानमंत्री मोदी तो नहीं हैं ना? या समझने लगे हैं की हैं? मान लो, आप नरेंदर हों, वीरेंदर हों, कविता हों, सुनील हों, ऋतिक हों, सोनिया या राहुल हों? मगर कौन से? कोई MLA, MP, क्रिकेट प्लेयर, या? कौन? जहाँ कहीं अपने ये फर्क समझने में गड़बड़ कर दी, वहीं आप राजनितिक पार्टियों के जालों के शिकार में हैं। जितनी ज्यादा दिमाग में वो गड़बड़, उतनी ही ज्यादा ज़िंदगी में। 

ऐसा भी नहीं है, की ये राजनीतिक पार्टियाँ आपकी मर्जी या पसंद-नापसंद से ही करेंगी। उनका तो रोबॉटिक एन्फोर्स्मेंट प्रोग्राम आपकी जानकारी के बिना भी चलता है। बल्की, ज्यादा अच्छे से चलता है। 

तो, जितना आपको ये समझ आना शुरु हो जाएगा और जितना आप इससे खुद को दूर करना शुरु कर देंगे, उतने ही इस रोबॉटिक एन्फोर्स्मेंट के दुस्प्रभावोँ से भी बचते जाएँगे।                        

Psychological and Economic Warfare?     

आज की दुनियाँ इससे बहुत ज्यादा प्रभावित है। या कहो की कोढ़ और रोबॉटिक एन्फोर्स्मेंट की राजनीती टिकी ही इस पर है। सब इस पर निर्भर करता है, की आपकी जानकारी किसी भी इंसान या विषय, वस्तु के बारे में कितनी सही है। और कितनी नहीं है? या कितनी गलत है?  

वो फिर एक तरफ, देशों के युद्ध so-called officers द्वारा फेसबुक के झंडों में हों या दूसरी तरफ, गाँवों की फालतू पड़ी ज़मीनो पर कम-पढ़े लिखों या बेरोजगारों द्वारा। 

वो फिर एक तरफ? AC studios में बैठकर, खास इफेक्ट्स डाल कर भड़ाम-भड़ाम करते और TRP और पैसा बटोरते चैनल हों। या फिर उपजाऊ ज़मीनों को शिक्षा या राजनीती के धंधे के नाम पर, हड़पते शिक्षण संस्थानों के प्रधान हों या उनके कोई अपने। 

और दूसरी तरफ? सच में किन्हीं ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ते, या सेनाओं के हमलों में मरते, आम नागरिक या खुद उन सेनाओं के जवान। फर्क सिर्फ उन घरों को या लोगों को पड़ता है। बाकी, अपने-अपने और अपनी-अपनी तरह के झंडे गाड, यहाँ-वहाँ तबाही मचा या लूटपाट कर या हड़पकर चलते बनेंगे। 

वैसे उपजाऊ खेती की ज़मीनों को 2-बोतलों या औने-पौने दामों में हड़पते, शिक्षण संस्थान और किसी NSDL या Protean की वेबसाइट के नाम पर ऑनलाइन धोखाधड़ी का, आपस में कोई लेना-देना है क्या? जानने की कोशिश करते हैं आगे, किसी पोस्ट में। 

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर और युद्ध? 4

 युद्ध, युद्ध, युद्ध? 

ऐसा ही कुछ सुन रहे हैं क्या आप?

या आप जो न्यूज़ चैनल्स देखते हैं, वहाँ सब शांति शांति है?

ऐसे कैसे?

ऐसी ही दुनियाँ में हैं हम?

यहाँ भी अगर आप भारत के न्यूज़ चैनल्स देखेँगे तो वो कुछ कहते नज़र आएँगे या कहो की चीखते नज़र आएँगे और पाकिस्तान के न्यूज़ चैनल्स देखोगे तो वो कुछ?

ऐसे कैसे? दोनों जैसे एक दूसरे के बिलकुल विपरीत चीख रहे हों?

या आप चीखने वालों की बजाय, शाँत तरीके से सही मुद्दों के चैनल्स को देख रहे हैं? तो वो शायद, शेयर बाजार की बात तो नहीं कर रहे? ऐसा लगता है, युद्ध वहीँ चलते हैं?    

या ज़मीनो की लूटखसौट पर?  

या  

कोई ऐसे भी युद्ध होते हैं जो शिक्षा की बात करते नज़र आएँ? गरीबों की बात करते नज़र आएँ? समाज के कमजोर वर्गों, बच्चों या पिछड़ों की बात करते नज़र आएँ?

रोटी, कपड़ा, मकान, साफ़ सफाई, स्वच्छ खाना पानी वैगरह की बात करते नज़र आएँ?

नहीं? इस स्तर पर लोगों का भला करने के लिए कोई युद्ध नहीं होते?

युद्ध सिर्फ और सिर्फ मार्केट के लिए या अपनी आम भाषा में कहें, तो धंधे के लिए होते हैं?  

ये युद्ध तो नहीं चल रहा कहीं कोई?

या कोई ड्रिल चल रही है?

नौटँकी जैसे कोई?

ठीक ऐसे, जैसे पीछे वाली ज़मीनखोरों का धँधा वाली पोस्ट?  

थोड़ा डिटेल में आएँगे इस पर भी, आगे किसी पोस्ट में। 

आजकल सीख रही हूँ, थोड़ा बहुत ये वाला कोढों का जाल भी  

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 3

 नई सीरीज शुरु हो गई? चल तो पहले से रही है, थोड़ा पास से समझ आनी अब शुरु हुई है? पीछे की कई सारी पोस्ट को भी धीरे धीरे लगाएँगे इस सीरीज में। अभी नंबरिंग यहीं से शुरु कर दें?  

जो अपनी बैंक की कॉपी सँभालने लायक तक नहीं, वो जमीन के सौदे क्या करेगा? कौन-से दिमाग से करेगा?

और? 

और लूटपाट और हत्याएँ भी?

सुना आज जमीनखोर प्रधान और क्रिकेटबाज़ भतीजा, जमीन नपवा रहे थे?

किससे?

और किसे बुलाया?

ऐसे-ऐसे गिरे हुए लोग उन्हें ही बुलाते हैं, जिनसे वो आसानी से निपट सकें? भोले-भाले, कम-पढ़े लिखे लोग? जो अक्सर ऐसे-ऐसे लोगों की चालों में बड़ी ही आसानी से आ जाते हैं? 

नप गई ज़मीन? किसकी ज़मीन? उससे पहले ये तो तय हो? 

और कौन सी ज़मीन? आगे वाली या पीछे वाली? 

आज इस ज़मीनखोर प्रधान के पास इतना वक़्त कैसे निकला? ऐसी भी क्या जल्दी, भला? अरे, आपसे तो कोई न कोई मिलने आया रहता है, शायद? नहीं? स्कूल में ही इतने वयस्त हैं? फिर ये, बलदेव सिंह वाली ज़मीन की नापा-तोली से आपका क्या लेना-देना? वहाँ कैसे घुसे हुए हैं आप, चाचा और भतीजा?  

तो? जो कभी-कभी पीता (पीटा?) है? उसकी ज़मीन क्रिकेटर भतीजे ने हड़प ली? इतनी लताड़ के बावजूद, मान लेना चाहिए की औकात तो बड़ी है, बहशर्मी की भतीजे? अब चाचा जब जमीन नपवाने में साथ है, तो ये कैसे हो सकता है, की हडपम-हडपाई में साथ ना हो? कितने के लिए डूब गए? दो कनाल के लिए?

अरे नहीं किस्सा इससे आगे है? 

अजय की तो ऐसे भी और वैसे भी है ही आपकी? उससे हमें क्या लेना-देना? सही बात ना? कौन से साल में द्वार लग गए थे उधर? 

बेबे CCL दे दी के?

मिल भी ली?

अब ये कहाँ से आ गया?

चलो ABCD में नहीं उलझते? ना ही कंप्यूटर वाली मुत्तो-हागो में? तो Query क्या थी? Query ये है जी, की आम-आदमी को कितनी तरह और कैसे-कैसे लूटा जा सकता है? 

अगर कोई आम इंसान स्कूल से तंग आकर, टीचर की नौकरी छोड़कर, अपना खुद का स्कूल खोलना चाहे, तो गड़बड़ घोटाला? उस टीचर को ही ख़त्म कर दो? कितने ही तो तरीके हैं?

अब आम इंसान के ये कहाँ समझ आना? इल्जाम भी उन्हीं पर लगाने की कोशिश करो? उसके बाद तो सबकुछ ही तो तुम्हारा? कैसी-कैसी ऑक्सीजन कैसे-कैसे ख़त्म होती हैं? और ज़मीनी-धंधे वाले बेज़मीर लोग, कैसे-कैसे घर खा जाते हैं?  

ओह हो! उसके बाद तो लड़की को भी कहीं और ही भेजना था ना? सामान्तर घड़ाईयों के hype ऐसे ही घड़े जाते हैं? बुआ आ गई बीच में? बड़ा रोड़ा? नहीं, बिलकुल छोटा-सा? खिसका दो? कोशिश तो पूरी करली? नहीं अभी ख़त्म नहीं हुई हैं कोशिशें, अभी ज़ारी हैं? ये ज़मीनखोरी उसी कड़ी का एक हिस्सा है। अब क्या करेगी? जो आप चाहेंगे  वही करेगी? और दीदी कब जा रहे हो?

जाना था क्या कहीं मुझे? मुझे तो लगा ये जो ज़मीन की नापतोल की कहानी रची जा रही है, यहीं कुछ वक़्त रहना था?       

और बे बे? जग के, के हाल-चाल? 

जग से जग्गा या जगतजननी? या? जग्गा धरी? या वो दूध वाला जग, और उसकी नौटंकियाँ?  

चल छोड़। लोगों को नहीं मालूम, कैसे-कैसे ड्रामे रचे लोगों ने? इधर वालों ने भी, और उधर वालों ने भी?   

तो नप ली ज़मीन भतीजे? ओह हो! ज़मीन-खोर प्रधान को कैसे भूल रहे हो? 

तो यहाँ अजय की तरफ निकली थोड़ी-सी ज़मीन? 

यही Query थी? मुतो-हागो प्रधानों की? 

क्यों कम पढ़े-लिखे और आज की तेज-तर्रार टेक्नोलॉजी वाली दुनियाँ से अंजान, लोगों की हर तरह से ऐसी-तैसी कर रखी है?

बहन का भी कुछ तो हिस्सा होगा? छोड़ो। बहनो-बेटियों का कुछ नहीं होता यहाँ, उन्हें इधर-उधर फँसाने की कोशिश करने के सिवाय?    

तो यहाँ प्र्शन इतना-सा तो वाजिब है, की जो अपनी बैंक की कॉपी सँभालने लायक तक नहीं, वो जमीन के सौदे क्या करेगा? कौन-से दिमाग से करेगा? 

ये ज़मीनखोर लोग फिर किसकी ज़मीन और क्यों अपने नाम करवा रहे हैं? ऐसा ही कुछ बोला ना भतीजे ने? बुआ वो तो अब मेरे नाम हो ली?   

क्यूँकि, हमारी गिरी हुई राजनीतिक पार्टियाँ ऐसे-ऐसे ज़मीनखोरों के साथ होती हैं? अब आप गिरे हुए हैं या नहीं, और गिरे हुए हैं तो कितने वो आप जाने? 

आप तो शायद नहीं गिरे हुए?  

और आप बिलकुल नहीं?

और आप तो बिलकुल ही नहीं?

हाँ तो आप पे तो ये प्र्शन ही लागू नहीं होता?   

जिसकी ज़मीन हड़पने की कोशिशें हो रही हैं, उसकी बहन की तरफ से, अगर कोई कोर्ट ज़िंदा हो, तो ये धोखाधड़ी का केस दायर कर लें, इन ज़मीनखोर चाचा-भतीजे के खिलाफ। 

किसी औरत की मौत का मतलब यहाँ, ज़मीन का धंधा है? वो भी किसके द्वारा? एजुकेशनल सोसाइटी के नाम पर, बिना हिसाब-किताब की ज़मीन-जायदाद और पैसा इक्क्ठ्ठा करने वालों द्वारा?  

ऐसे-ऐसे संस्थानों पर करवाई क्यों नहीं हो, जिनके टीचर्स को नाममात्र मिलता है और उन संस्थाओं के लोग तकरीबन हर साल, एक नई बस खरीद लेते हैं? 8-10 किले एक साल में, एक ही गाँव में खरीद लेते हैं? इस शहर, उस शहर उनके पॉश इलाकों में मकान और दूकान होते हैं? सुना है उनके बच्चों की पढ़ाई के नाम पर भी अच्छा-खासा खर्च होता है? वो भी एक ऐसा स्कूल, जो अपने आपको गरीब और दानी बताता है? सच है क्या ये?   

और एक टीचर अपनी पूरी ज़िंदगी में एक ढंग का मकान बनाने लायक नहीं होता? वो अगर अपना कुछ करना चाहे, तो उसे खा जाते हैं? घौटालों के संस्थान हैं ये, या शिक्षण संस्थान?       

Conflict of Interest की राजनीती क्या कुछ करती है और करवाती है, लोगों से?     

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 2

 जो अपनी बैंक की कॉपी सँभालने लायक तक नहीं, वो जमीन के सौदे क्या करेगा? कौन-से दिमाग से करेगा?

जब 5 लाख कुछ रुपए भाई के बैंक आए, उससे पहले एक यस बैंक का नाटक रचा गया। किस तारीख को आए ये 5 कुछ, किसी के खाते में? किस बैंक का है वो खाता? अहम है क्या, ये सब जानना? हाँ। अगर आपको राजनीतिक पार्टियों के सामान्तर घड़ाई वाले कारनामों को जानना है, तो बहुत जरुरी है। किसने सँभाली फिर वो बैंक की कॉपी? या कहो किस, किसने? कब-कब पैसे निकाले गए उससे? वो पैसे कहाँ खर्च हुए? जहाँ खर्च हुए, वहाँ उसको जरुरत थी क्या?      

चलो ये तो मात्र 5 कुछ की कहानी है। इस दौरान मैंने थोड़ी छानबीन शुरु कर दी थी। उस छानबीन के साथ कुछ एक नरेटिव यहाँ-वहाँ से आ रहे थे। 

आंटी: ना ऐसे तो नहीं करना चाहिए। ऐसा हुआ है तो गलत है। मैंने तो सुना है 30-35 लाख के आसपास दी है। 

अच्छा? वो पैसा कहाँ है? कौन से अकॉउंट में? जिन्हें खुद वो ज़मीन किसी काम के लिए चाहिए थी, वो उसे किस कीमत पे देंगे? देंगे क्या? सबसे बड़ी बात उसे कोई बो रहा है। ढंग की इन्हें पकड़ा देंगे, तो ये क्या करेंगे? 

ये तो मुझे नहीं मालूम। 

अजय का क्या रोल है, इसमें?

उसका क्या रोल होगा। कुछ नहीं है। 

वो खुद कह रहा हो तो?

गलत है। उसका क्या मतलब, ऐसे किसी की ज़मीन दिलवाने का?

वही मैं पूछ रही हूँ। आपके प्यारे हैं, पूछना उनसे, ये कैसे घपले रच रहे हैं? वैसे भी वो पहले ही कुछ केसों से मुश्किल से निकला है। फिर से क्यों कहीं फँसना चाहता है?

बावला है। नूं ना दूर रहूँ। 

दीदी आपने बुलाया मुझे?

हाँ। क्या चल रहा है, उस ज़मीन का? ये कौन-से और कैसे पैसों के लेनदेन हो रहे हैं, रुंगे जैसे से?

मुझे तो पता नहीं। 

वहीं पड़ा रहता है तू। फिर कैसे नहीं पता?

पता चला तो बताऊँगा। 

भाई घर की घर इसा साँग बढ़िया ना होता। यहाँ कुछ होगा तो आँच तुम्हारे यहाँ नहीं आएगी, ये मत सोचना। 

देख लाँगे। 

प्लॉट की तरफ घुमने गई तो कोई ट्रक आया हुआ था, ईंटों से भरा। 

अरे रुको। किसने मँगवाई हैं ये?

पड़ोस से कोई बोलता है, अजय ने। 

अच्छा, क्या चल रहा है यहाँ? कुछ बनवा रहे हैं?

शायद, प्लॉट की चारदीवारी। 

कुछ दिन बाद पता चलता है, वहाँ जो भाई का रहने का छोटा-सा कमरा है, उसपे ही लग रहे हैं वो रोड़े। और भाई अक्सर वहाँ से गुल मिलता है। कभी-कभार मिलता है, तो पॉलीथिन में कोई प्याजों की सड़ांध के साथ खाना लिए हुए। 

ये क्या है? कहाँ रहता है तू आजकल? घर क्यों नहीं खाता खाना? फिर से शुरु हो गया? कहाँ से हो रही है ये जगाधरी की सप्लाई?  

अजय: 2 महीने हो गए, होटल पे खाता है। 

2-महीने? घर क्या फिर इसका भूत जाता है खाने?

मैंने लगवाया हुआ है?

ओह। धन्यवाद बताने के लिए। तो ज़मीन के नाम का ये रुंगा होटल पर या रेस्टोरेंट में जाएगा? इसीलिए, ज़मीन बिकवाई है? तुझे कितने मिले खाने को? खुद भी खाता है क्या होटल पे, बिना कुछ कमाए? कितने दिन चल जाएँगे इतने से पैसे होटल या रेस्टोरेंट? इसीलिए इसे घर नहीं आने दिया जाता? ऐसे तो जल्द ही काम तमाम कर दोगे इसका। दारु और होटल, मस्त काम है। 

छोटू वहाँ से खिसक चूका है, अपने प्लॉट की तरफ। 

और यहाँ मत दिखा कर मेरे को। तेरे जैसे भाइयों के होते दुश्मनों की क्या जरुरत?

मैंने बोला, यहाँ मत दिखा कर। और पता चला वहाँ मेरा ही ईलाज भांध दिया गया, की मैं ही वहाँ ना दिखूँ। इस दौरान घर पर बैड पर चाकू या डंडा रख जाना, जैसे कारनामे भी शुरु हो चुके थे, इसी भाई द्वारा जिसकी ज़मीन बिकी थी? बिकी थी? या रायगढ़ के होटल के नाम हुई थी? और ईधर-उधर, चेतावनियाँ भी आने लगी थी। संभल कर, तेरा पक्का ईलाज बँधवाने के चक्कर में हैं। रोड़ा है तू, जिस घर को वो उजाड़ने चले हैं, उसे बचाने का काम कर रही है। बोतल वाले को ऐसे ख़त्म कर रहे हैं, तुझे उसी के हाथों करवाने के प्लान हैं। 

कौन हैं ये लोग? और क्यों? अपने घर को ऐसे-ऐसे लोगों से कौन नहीं बचाने की कोशिश करेगा?

और जवाब मिला, Conflict of interest की राजनीती। जो लोगों को आपस में ही भीड़वाकर, इधर भी खाती है, और उधर भी।  छोटे-मोटे से लालच, छोटे-मोटे से डर पैदा कर लोगों के दिमाग में।      

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 1

 ज़मीन खोरों के जबड़ों में किसान और आम इंसान? 

या ज़मीन खेतखलिहान 

और

शिक्षा और राजनीती के नाम पर, ज़मीन हड़पने के अभियान?  

ये सब यही है क्या?

रोज-रोज आती 

खामखाँ-सी, फ़ालतू-सी इमेल्स? 

स्पैम जैसे कोई? 

या? 

बीच में बलदेव सिंह की ज़मीन और दोनों तरफ?

शिक्षा के नाम पर ज़मीनखोर?

ज़मीनी धंधे वाले? हरदेव सिंह की ज़मीन?   

दोनों भाईयों की बराबर नहीं थी जमीन तो?

फिर ये कैसे?

थी?

तुमने शिक्षक बनकर उनके लिए कमाया?

 और उन्होंने?

उसी शिक्षक को भी खाकर  

अपने धंधे को आगे बढ़ाया?  

शिक्षक ने अपना खुद का स्कूल बनाने की क्या सोची?

उसको भी ठिकाने लगा दिया?

और उस ज़मीन को भी हड़पम-हड़पायी?       

या ऐसे?

या ऐसे?

ऐसे?

या ऐसे?

ऐसे?

या ऐसे?


 या शायद ऐसे?

गोलमाल है भई, सब गोलमाल है?  

सोना से, सोनि आ?

और सोनि आ से सोना लिका?  

कहीं नेता का हिस्सा?

तो कहीं शिक्षा के नाम पर?

ज़मीनखोरों का?

ज़मीनी धंधा?

और उनके बीच 

आम इंसान पिसता ऐसे,

साँड़ों के बीच में जैसे?

 इंसान सिर्फ कोई झाड़?

जैसे चाहें, वैसे ठिकाने लगा दें?

कब किन सत्ताओं को 

या  

राजनीतिक पार्टियों को फर्क पड़ता है? 

स्टीकर ले लो स्टीकर 2 (Social Tales of Social Engineering)

स्टीकर जो बड़े साहब, बड़े लोग (?), राजनीतिक पार्टियाँ या कम्पनियाँ आप पर, हम सब पर, हर वक़्त चिपकाने की कोशिश में रहते हैं। जितने ज्यादा वो उसमें सफल होते जाते हैं, उतना ज्यादा उनका फायदा और हमारा, आपका, आम आदमी का नुक्सान होता जाता है।   

अभी पिछले कुछ सालों में हुई घटनाओँ या दुर्घटनाओँ से समझने की कोशिश करते हैं। 

जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा, आधा एकड़, जिसपे स्कूल वालों की निगाह तभी से थी, जबसे वो ज़मीन सब भाइयों (दादा, अलग अलग पड़दादाओं के बच्चे) में बटी थी। बहुत बार माँगने के बावजूद, वो उन्हें नहीं मिली। इसी ज़िद में उन्होंने अपना एक खाली पड़ा खंडहर का टुकड़ा तक नहीं दिया। आज तक वो ना सिर्फ खाली पड़ा है, बल्की आसपड़ोस के सिर दर्द भी है। अब उसके हाल ये हैं की उसे कोई लेने को तैयार भी नहीं। मगर, स्कूल के साथ लगती ज़मीन को जिस किसी बहाने, इन महान स्कूल वालों ने कब्जाया हुआ है, धोखाधड़ी से। मगर पेपरों में so called Legally । 

क्या ये इन्हीं स्कूल वालों ने कब्जाया हुआ है? या ये भी एक सामान्तर घड़ाई है? चलो जानने की कोशिश करते हैं। 

मान लो, दो नंबर हैं। एक है 5 और दूसरा 4, ये नंबर कुछ और भी हो सकते हैं। 

पाँच को pair बनाना है। मोदी वाला डबल? उसके लिए चार को पाँच के बीच रखना है? ये कोई और नंबर भी हो सकते हैं और जो कहा उसका उल्टा भी। यहाँ हमने चार और पाँच माना है। तो ये हो गया 5 4 5 

मान लो 5 को दस साल के लिए, चार ने block कर दिया। दस किसने देखा? अभी तो ब्लॉक करो। आधा किला मतलब चार कनाल। 4 को दो टुकड़ों में काटों। इसका आधा हिस्सा बड़े वालों को दो। स्कूल वालों को। एक भाई के बच गई, उस जगह 2 कनाल। दूसरे की वहाँ की 2 कनाल हड़प ली। वो वहाँ के स्कूल वालों के नाम। दो कनाल से भर जाएगा उनका? अरे Protection के लिए ली है। मगर कैसा Protection? और किसका Protection? यहाँ ये 2 नंबरी का क्या हिसाब-किताब है? ये भी कुछ खास है क्या? इसे 654 या 652 या ऐसा कुछ कर दें तो? बड़ी उलझ-पुलझ खिचड़ी है। नहीं? राजनीती के दाँव-पेंचों में ऐसा ही होता है। मुझे तो यूनिवर्सिटी का 2 नंबरी गार्ड लग रहा है? कुछ काँड हैं, उन्हें दबाने के लिए खास गॉर्ड चाहिएँ? और उन कांडों की सजा को कम करने के लिए वक़्त?

वक़्त, अक्सर बड़े लोगों के लिए एक बहुत ही अच्छा तरीका होता है, अक्सर केसों को उल्ट पलट करने के लिए? वक़्त के साथ ज्यादातर सजा शिकायत करने वाला ही भुगतता है? और महान लोग अक्सर बच निकलते हैं? ऐसा ही?          

अच्छा? तो आम-आदमी इस सबमें क्यों फंसे?   

फंसे नहीं। उन्हें फँसा लिया जाता है। छोटे-मोटे लालच। छोटे-मोटे डर। इस छोटे से ज़मीन के टुकड़े का, कितनी मौतों या बीमारियों से लेना-देना हो सकता है? या शायद इसके आसपास की ज़मीनों का भी? ज़मीनो के ये नंबर किस तरह के स्टीकर हैं? सिर्फ नंबर या उससे आगे भी कुछ, कोढ़ जैसे? जैसे लोगों के या उन ज़मीनो के खास हिसाब-किताब वाले कोड? राजनीतिक पार्टियों के ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे नंबर होते होंगे? उनके नाम पे आम आदमियों के कितने ही झगड़े? कितने ही रिश्तों के हेरफेर? कितनी ही बीमारियाँ या मौतें? छोटे-मोटे लोग, छोटे-मोटे जमीनों के झगड़े? बड़े लोग, बड़े-बड़े ज़मीनो के वाद-विवाद? जैसे राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के या बड़ी-बड़ी कंपनियों के? राज्यों के आपसी झगड़े या देशों के? वहाँ पे भी ऐसे-से ही कोड होते होंगे?

जैसे? 

कहीं इस गाँव के स्कूल के आसपास की ज़मीनो की कहानियाँ। तो कहीं किसी यूनिवर्सिटी के किसी डिपार्टमेंट के वाद-विवाद? 

कान्ता कहाँ यूनिवर्सिटी में? जिसे किसी घर की चाबी सौंपने को बोला जाए। तो कहीं कान्ता, यहाँ इस ज़मीन के केस में भी कोई? किसी की माँ? किसी स्कूल का कोई अहम किरदार?  

ऐसे ही जैसे कहाँ मुम्बई में बैंक में काम करने वाला कोई अजय? और कहीं किसी पार्टी का नेता? या फिर कोई इस जमीन के केस में बिचौलिया? ये सब कहीं मिलता है? या ऐसे ही तुक्के हैं, खाँमखाँ के?

ऐसे ही जैसे कहीं इस ज़मीन का पैसों का हिसाब-किताब? तो कहीं, किसी घर के किराए का?

ठीक ऐसे ही जैसे, कहीं कोई तालाब और आसपास के लोगों के घरों के ज़मीन सम्बंधित वाद-विवाद? और कहीं और? मोदी के प्लाट से अभय के घर तक के ज़मीनो के हिसाब-किताब? इनसे आगे इधर-उधर भी जा सकते हैं। और आगे और पीछे भी। जिसे कहा जाता है, आपके आसपास का सिस्टम। 

आप खुद एक सिस्टम हैं। जिस वक़्त आप जहाँ कहीं हैं, उसके आसपास का सिस्टम, उस वक़्त आपकी ज़िंदगी को बनाता या बिगाड़ता है। इसलिए अगर पीढ़ी दर पीढ़ी आप किसी एक जगह हैं तो जहाँ एक तरफ वहाँ का सिस्टम आपको फायदा करता है। तो दूसरी तरफ कुछ गड़बड़ होने पर मार भी आप पर ज्यादा पड़ती है। ना की उन पर जो वहाँ से निकल चुके या नाममात्र हैं।   

ठीक ऐसे ही जैसे, कहीं मदीना रेडियो स्टेशन के आसपास के ज़मीनो के हिसाब-किताब तो कहीं ?

ऐसे ही जैसे कहीं बरहे के एक तरफ वाल्मीकियों के घर, साथ वाले गाँव से आए हुए वाल्मीकि और उनके आसपास के ज़मीनो के हिसाब-किताब और कहीं?

ऐसे ही कहीं की भी ज़मीन का केस है। या कोई वहाँ क्यों है? या क्यों और कहाँ छोड़ के चले गए, सिस्टम बताता है? राजनीती बताती है। और आप सोचते हैं, ये सब आप खुद कर रहे हैं?

और ये सिर्फ ज़मीन पर ही लागू नहीं होता। बल्कि, वहाँ के हर जीव-निर्जीव पर। उनकी ज़िंदगी से सम्बंधित हर पहलु पर। आम आदमी की ज़िंदगी में जितने ज्यादा स्टीकर राजनीतिक पार्टियों की जबरदस्ती के हैं। उतने ही वो आपके फायदे के नहीं हैं। शायद इसीलिए, इन स्टीकरों को और आप पर इनके प्रभावों या दुष्प्रभावों को जानना बहुत जरुरी है। 

वो स्टीकर बेचने वाले भैया तो अभी तक नहीं आए। तब तक थोड़ा और स्टीकरों के बारे में जानने की कोशिश करते हैं।    

कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, जैसी-सी कहानियाँ

अभी पिछले साल (?) दो भाई-बहन दुबई की सैर पे गए। हाँ, तो क्या खास है? दुनियाँ जाती है। बहन की फिर शादी हो गई, इंटरकास्ट और भाई ने ज़मीन हड़प ली, किसी अपने की ही। होता रहता है, इसमें भी क्या खास है? किसी पियक्कड़ की ज़मीन, कोई भी हड़प ले? फिर ये तो शायद किसी अपने ने ही ली है, protection के लिए। बिचौलिया अहम है।   

सोचो इन सबका दुबई-बाढ़ से क्या लेना-देना?    

रैली पीटें थोड़ी? भाई-बहन की? बिचौलिए की? ऐसी शादी की? और ऐसे protection की? ये रैली कौन और किसकी पीट रहा है? या पीट रहे हैं? कहाँ-कहाँ और किन-किन लोगों की? कौन-कौन पार्टियाँ या उनके कर्ता-धर्ता? इस सबका किसी को दुनियाँ से ही खिसकाने से भी कोई लेना-देना हो सकता है? खिसकाने वाले कौन और नाम किसका लगाने की कोशिश हुई? अजीबोगरीब जाले हैं, ना? वहाँ फिर क्या लाकर रख दिया? किसने और कैसे? ये कौन अपने हैं, जिन्होंने ये सब रचा? आम आदमी? उसकी समझ से बाहर है, ये कहानी। या ऐसी-ऐसी और कैसी-कैसी, कहानियाँ। ये वो बता सकते हैं, जो आदमी को रोबॉट बनाते हैं। वो फैक्टरियाँ, जो दुनियाँ भर में ये सब करती हैं। अहम? कैसे? और आम आदमी को ये सब कैसे समझ आएगा? उसके लिए उसे कैंपस क्राइम सीरीज़ को समझना होगा।        

अच्छा ये ED-ED क्या है? ये ED-ED? कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे EC-EC?      

ED के आगे B लगे तो क्या बनता है? B. ed? या B. ED? या Bed? या खाटू? खाटू के कितने रंग हैं? झंडे के? इतने क्यों? ये हिन्दू है? मुस्लिम है? क्रिस्टियन? या सिख?

B. ED कितने में होती है?

जो B.ED करवाते हैं, वो खुद कितने पढ़े-लिखे हैं? 75000, एक साल के, एक B.ED करने वाला देता है? एक साल में, एक ही कॉलेज से कितने B.ED करते हैं? ये so-called कॉलेज वाले, एक साल में सिर्फ B.ED से ही कितना कमाते हैं? वो भी शायद, घर बैठे? टीचर्स क्या करते हैं? और उसके बावजूद कितना कमाते हैं? उनकी कमाई घर बैठे-बैठे ही कौन-कौन खा जाता है? क्यों? वो इतने नालायक क्यों हैं? कैसी डिग्री के लिए इतने पैसे देते हैं? ये शायद वो प्रश्न हैं, जो मुझे रितु (भाभी) ने या उस वक़्त मेरे कुछ अपनों के यहाँ विजिट्स ने समझाए। बहुत कुछ उसके काफी बाद में समझ आया। शायद ये भी, की रितु को और उसके घर को कौन खा गए? और नाम फिर किसका लगाने की कोशिशें हुई? 

ये भी की आज तक यूनिवर्सिटी, मेरा पैसा क्यों रोके हुए है?

ये भी की भाभी के जाते ही, ये किस खास अपने बिचौलिए ने, so-called अपनों को ही, दूसरे भाई की ज़मीन थमा दी? 

बहुत से so-called अपनों के शब्द भूलते नहीं हैं। जम गए हैं, जैसे कहीं। जैसे, “देख दम, मेरी आपणे घर मैं भी चालय, अर थारे भी। थाम भी चला लो न (माँ-बेटी)।” भाभी के जाने के बाद, जब बुआ-दादी को भी किनारे करने की कोशिशें हो रही थी। और गुड़िया को कहीं और पार्शल करने की। कहना तो चाह रही थी, की चाल्या तो तब करेय ना, जब कोई चलाना चाहे। पर ना वक़्त था इतना बोलने का और ना अकसर मन होता, ऐसे गँवारों से तू-तू, मैं-मैं करने का। यहाँ तो यही नहीं समझ आता, की लोग दूसरों के यहाँ अपनी चलाना क्यों चाहते हैं? अपनी ज़िंदगी अपने अनुसार चल जाय, वो बहुत नहीं होता? ज्यादातर, अपना शरीर ही नहीं चलता, अपने अनुसार तो। पता नहीं कब, कहाँ और क्या हो जाता है? और ठेकेदारी औरों के घर, अपने अनुसार चलाने की चाहतें? पता चल गया होगा अब तक तो, ऐसे लोगों को भी थोड़ा-बहुत शायद? ये वो दुनियाँ है, जहाँ बीमारियाँ और ऑपरेशन तक, राजनीती के कोढों के अनुसार होते हैं। इधर वालों को कोई पार्टी धकेल रही होती है और उधर वालों को कोई और। काटते रहो, एक दूसरे को ही।  

बहुत ज़बरदस्त खिचड़ी पकी होती है, ऐसे सामान्तर घड़ाईयोँ में। और भी अहम। ये घढ़ाईयाँ घड़ती राजनीतिक पार्टियाँ हैं। और आम-आदमी, एक-दूसरे को ही कौस रहा होता है। कैसे?

जैसे एक भाभी ने बताया की उसने B.ED करने के 60000 एक साल के दिए थे। तो दूसरी ने बताया, 75000 लेते हैं। नहीं। ये उन्होंने नहीं बताया। मैं जहाँ कहीं जाती, अकसर वहाँ उन लोगों के पास कहीं से भी फ़ोन आ जाते थे, उन्होंने बताया? उसपे कमेंट्री फिर कहीं, किसी आर्टिकल में, या सोशल मीडिया पे मिलती, की यहाँ घड़ाई क्या चल रही है। बहुत-सी पार्टियों की इधर या उधर पहुँच या घुसपैठ, कुछ हद तक ऐसे समझ आई।  

ऐसे ही जैसे, जब कुछ अपनों ने बोला, तुम अपना हिस्सा क्यों नहीं ले लेते। इस सोशल मीडिया या आर्टिकल्स ने ही बताया, की ये सब क्या था। Indirect ways to inform about indirect tunnels of different parties . अलग-अलग पार्टियों के अलग-अलग तरह के उकसावे, तरीके फूट डालो, राज़ करो के? 

आप जहाँ कहीं जाते हैं या देखते हैं या समझने की कोशिश करते हैं, यूँ लगता है, ये तो इन्हीं के खिलाफ रखा हुआ है। और ये, ये सब ऐसे कर रहे हैं, जैसे किसी और के खिलाफ। ऐसे ही शायद, जैसे कोई आपको चिढ़ाने या तंग करने की कोशिश में, खुद की ही रैली पीटने लगें?   

कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा? जैसी-सी कहानियाँ हैं ये। इधर भी और उधर भी।          

आपका घर कहाँ है?

आपका घर कहाँ है?

ये प्रश्न 

“बेचारे तबकों” में शायद हर औरत का है? 

नहीं। 

हर बेहद गरीब इंसान का है? 

फिर इससे फर्क नहीं पड़ता 

की आप लड़की हैं या लड़का 

अगर लड़की हैं तो 

इससे भी फर्क नहीं पड़ता 

की आप दादी हैं?

माँ हैं?

बुआ हैं?

बहन हैं?

बेटी हैं?

या बहु? 

अगर आप लड़का हैं तो भी 

कुछ-कुछ ऐसा ही है। 

फिर किससे फर्क पड़ता है?

दादागिरी से?

गुंडागर्दी से?

सभ्यता से?

संस्कारों से? 

रीती-रिवाज़ों से?

या? 

आप कहाँ रहते हैं? 

और कैसे लोगों के बीच रहते हैं, शायद इससे?