जमीन के कोढ़ की अजीबोगरीब राजनीती (जंग कालिखि?)

ज़मीनें खा गई, लोग कैसे-कैसे?

या लोग खा गए, ज़मीने कैसी-कैसी?

या जुए वाला सिस्टम और राजनीती खाता रहा है और खाता रहेगा इंसान कैसे-कैसे? रिश्ते कैसे-कैसे? ज़मीने कैसी-कैसी? और जीव कैसे-कैसे?

नौटंकियाँ, हकीकत और ज़िंदगियाँ? 

सिर्फ कुछ दिखाने या बताने के लिए? या सच में ज़िंदगियों को बदलने के लिए? अच्छे या बुरे के लिए? औरतें जब जमीनें होंगी, वो भी लोगों की प्राइवेट प्रॉपर्टी जैसे, तो कैसे-कैसे किस्से होंगे? कैसी-कैसी कहानियाँ होंगी? और कैसे-कैसे झगड़े होंगे?      

नाटकों को जब आप हकीकत समझने लग जाएँ। और हकीकत में नाटक जीने लग जाएँ, तो क्या होगा? वही जो हो रहा है। क्या हो, अगर कोई शातीर लोग अपनी हकीकत को आपने थोंपने लग जाएँ और आप उसी को हकीकत मान जीने लग जाएँ, पता होते हुए? या शायद पता ना होते हुए? आसपास की सब ज़िंदगियों की कहानियाँ कुछ-कुछ ऐसी ही हैं। 

आपको एक नाटकनुमा जहाँ पकड़ा दिया गया है, जिसे राजनीतिक पार्टियाँ जैसे चाहेंगी, वैसे घुमाएंगी। तो घुमते रहो, उनके अनुसार। आसपास के कितने ही केस सामाजिक सामान्तर घड़ाईयाँ हैं। आम आदमी को कैसे पता चले की वो सामान्तर घड़ाईयाँ हैं? जैसे सुशीला दीदी और संतरो कार केस और किसी खास जगह ब्रेक फेल? 

तीन abortions या फेल डिलीवरी के बाद किसी को एक लड़की हुई और वो पुरे घर का गठजोड़ बन गई जैसे। अब वो कुछ साल की हो चुकी थी और उन्हें एक लड़का चाहिए था। माँ का शरीर जवाब दे चुका था या पैसे की कोई दिक्कत थी? शरीर जवाब दे चुका था शायद? लग तो ऐसे ही रहा था। जब तक सिस्टम का बेहुदा जाला नहीं समझ आ रहा था। सिर्फ तब तक। हकीकत, बच्चा पैदा ही नहीं होने दिया जा रहा था? 

तुम ये कैसे कह सकते हो?

ऐसे ही जैसे, दो बच्चीयों के बालों की बनावट बदलने लग जाती है। जिसके पैदाइशी घुँघराले बाल थे, वो सिल्की होने लगे थे और जिसके पैदाइशी सिल्की बाल थे, वो घुँघराले होने लगे थे। 

ऐसे ही जैसे, माँ को 8-9 महीने से कोई पेट दर्द था। और जब उनकी पथरी का इलाज हुआ दिसंबर 2019, तो वो पूरा ड्रामा था। बिलकुल ऐसे जैसे, कोई M.Tech exams स्कैंडल जैसे। 3-1 cuts जैसे। 3 ईधर-उधर और एक नावल के पास। ठीक ऐसे ही जैसे, वो खास एम्बुलेंस दौड़ी थी, उस खास डायग्नोस्टिक सेंटर। और उसकी बेटी (मुझे) को घुमाया गया था इधर से उधर, जाने क्या दिखाने या क्या लेने।

ठीक ऐसे जैसे, मुझे जाड़ दर्द था और मैं गई थी PGI और मुझे मेरे अपने दोस्तों ने (दोस्तों?) घुमाया था यहाँ-वहाँ, इधर-उधर, जाने क्या-क्या दिखाने और क्या-क्या बताने? और आखिर में जाड़ में लगाया गया था वो अजीबोगरीब-सा इंजेक्शन। काँप गया था शरीर पूरा, दर्द से आँखों में थे आँशु और पसीना-पसीना पूरा शरीर। किसी जाड़ का इलाज तो पहले भी हुआ था, मगर ये क्या था, जो समझ से बाहर था? और उठ खड़ी हुई थी मैं, ईलाज ना करवाने के लिए या शायद कहना चाहिए की निकल आई थी वहाँ से। रविवार को जब घर आई, तो पता चला भाभी को भी जाड़ दर्द की शिकायत थी। और उन्होंने मेरा PGI डेंटल का अनुभव जान, जहाँ वो जा रही थी, उसी हॉस्पिटल जाने की सलाह दी थी। बाला जी वाला ईलाज चल रहा था उनका। जय बजरंग बलि? मैं भी वहीं पहुँच चुकी थी। और जहाँ तक मुझे मालुम था, तो फीलिंग होनी थी, मगर जाड़ ही निकाल दी गई थी। 2018 या 2019 की ही बात हैं ये।               

ऐसे ही जैसे, अभी पीछे एक खास तरह का ड्रामा सामने आया। काफी कुछ ड्रामा और काफी कुछ हकीकत। काली थार और दो कनाल जमीन। फिर से वही स्कूल के पास की ज़मीन। दो भाईयों का आधा किला ज़मीन, मतलब चार कनाल। वही दूसरे दादा के स्कूल के पास की ज़मीन, जिसपे भाई-भाभी का स्कूल बनना था। मगर फिर कुछ हुआ और भाभी ही नहीं रहे। क्या हुआ? वो जो बताया और दिखाया जा रहा था? या वो जो भाभी के जाने के बाद शुरू हुआ? वो सब काफी कुछ यहाँ-वहाँ लिखा जा चुका। 

2023 के आखिरी महीने पे चलते हैं। 

15 दिसंबर को पता चलता है, की 14 दिसंबर को स्कूल वालों ने वो जमीन खरीद ली। कौन हैं ये स्कूल वाले? दूसरे दादा के बच्चे। शायद भारत के चीफ जस्टिस बेहतर बता पाएँ इसपे? हैं ना अजीबोगरीब जहाँ? बड़ी ही छोटी-मोटी सी बातें और अजीबोगरीब से झगड़े, छोटे-मोटे लोगों के यहाँ। और पता बड़े-बड़े लोगों को होता है? जरुरी नहीं पता होता है, सही शब्द हो। मगर जब भतीजी कोई मूवी या दादी वाले सास-बहु के सीरियल देख रही हो और आप कहें कुछ ढंग का देख ले। और वो कहे हाँ, तारे जमीन पर देख लूँ। बच्चों की मूवी है। अब शायद तारे जमीन पे ऐसे भी होते हैं?

वैसे अमिताभ बच्चन हमेशा खास numerals के साथ ही ट्वीट क्यों करते हैं? पता चले तो मुझे भी बताना।    

कुछ-कुछ, ऐसे ही जैसे — “जाओ ऑनलाइन ले लो सब। ऑफलाइन तो तुम्हें पसंद नहीं?” 

या कोई दीदी को you. बना दे और कोई u? 

यहाँ YES! बैंक वाला ES नहीं है। सुना है, cryptic writing (जिसे मैं कोढ़-कोढ़ करती रहती हूँ) में CAPITAL LETTER, small letter, full stop, comma, colon ( : ), या gap के आने से ही अर्थ का अनर्थ और अनर्थ का अर्थ हो जाता है। Grammar बॉस जैसा-सा झमेला समझो।         

फिर से कोई 14? 

क्या खास है इसमें?

 राम मंदिर? Baptism? 3-1? 14? 15?    

सैक्टर 14 से संबंधित 2010 का कोई कांड? या कुछ और? 

मेरी i10 का खास ड्रामे के साथ, सोम समोसे, रोहतक के यहाँ से, फिर से 14 तारीख को अपहरण जैसा-सा कुछ? 

या फिर उसके बाद सैकंड हैंड ली गई, संतरो का किसी 14 को ब्रेक फेल होना, गाँव की किसी खास जगह?  

काली थार और वो खास नंबर, का इन सब इवेंट्स से क्या कनैक्शन हो सकता है? जानते हैं अगली पोस्ट में। 

किसकी ज़मीन?

आप जब दो-चार घंटे के लिए, वो भी दस-पन्दरह दिन में कहीं आते-जाते हैं, तो उस जगह को, उन आदमियों को नहीं जानते, वैसे — 

जैसे, जब किन्ही भी वजहों से आपको वहाँ रहना पड़ जाए। और कब तक, ये भी मालुम ना हो। इसी दौरान कुछ अजब से पहलुओं से मुलाकात हुयी, हमारी अपनी सभ्यता के। ऐसा भी नहीं, की इससे पहले बिलकुल भी वाकिफ़ नहीं थी। मगर, शायद ऐसे आमना-सामना नहीं हुआ, जैसे इस दौरान।  

आप 21वीं सदी की बात करते हैं, मगर कहीं-कहीं हालत आज भी शायद कई सदी पुराने हैं। और बनाये किसने? हमारे अपने पढ़े-लिखे जुआरियों ने। खासकर, वो काला कोट पहनकर न्याय की बात करने वालों ने? शायद कुछ हद तक। अब ऐसे-ऐसे cryptic केस लड़ोगे, तो समाज कहाँ जाएगा? उलझा रहेगा जातों, धर्मों में। निकल ही नहीं पायेगा, अजीबोगरीब जमीनों-जायदाद के विवादों से। जहाँ लोग लोभी, लालची और स्वार्थी ना भी हों, तो भी राजनीति के काले जाले और अजीबोगरीब बुने हुए ताने-बाने लोगों को धकेलेंगे ऐसे विवादों में। अपने-अपने राजनीतिक लाभ के लिए।   

और मान भी लिया जाए की राजनीती की मार शायद उतनी नहीं है, जितनी लालच या लोभ की, या एक परिवेश से उपजे मानसिक विचारों की। तो भी समाधान कहाँ है? मुझे कभी समझ नहीं आया की लड़कियों को अपना हिस्सा मांगना क्यों पड़ता है? और लड़कों को पैदायशी क्यों मिल जाता है? लड़की जहाँ पैदा होती है, वहाँ पराया धन कैसे हो सकती है? और वो अपने घर में ही पराया धन है, तो आगे जाके किसी ससुराल में अपना धन कैसे हो सकती है? सबसे बड़ी बात, यहाँ औरत सिर्फ़ और सिर्फ़ एक आदान-प्रदान का धन है? जैसे की जमीन किसी की? भला जमीन भी कभी किसी की हुयी है? हाँ, जमीन मरने के बाद सबको मुट्ठी भर जगह जरूर दे देती है। फिर वो राजे हों या रंक। किसके साथ गयी है? या जाने के बाद उसी की रही है? राजे-महाराजाओं की? या उनकी औलादों की? राजनीतिक मैप पर कुछ लाइन्स खींच देने से, या बाड़ें, दीवारें, हथियारबंद आदमी खड़ी कर देने भर से?

इस समाज के औरतों की ज़्यादातर समस्याएँ, इसी मानसिकता की ऊपज हैं। और सिर्फ़ औरतों की ही नहीं, बल्कि अपने आप में उस समाज की भी। इसका सीधा-सा समाधान है, की जहाँ लड़कियों को उनका हिस्सा न मिले या जिसके लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़े, ऐसी जमीन को उसके न रहने पर भी सरकारी घोषित कर दिया जाए। क्युंकि, ऐसे समाज में ऐसी लड़कियों को खत्म करने के चांस भी बढ़ जाते हैं। ख़ासकर, जब ताने-बाने के जाले पुरने वाले राजनीति से प्रेरित हों। 

मगर ऐसा सिर्फ लड़कियों के साथ हो, ये भी जरूरी नहीं। दुसरी किस्म की समस्याएँ भी हों सकती हैं। जैसे की ज़्यादातर, ज़्यादा शराब या ड्रग्स लेने वालों के साथ होता है। समझ से परे है, की जो इंसान बोल क्या रहा है, उसे ये मालुम हो या ना हो, मग़र वो अपनी जमीन बेचने लायक है? या बोतल थमाई ही ऐसे लोगों द्वारा जाती हैं, जो उस जमीन-जायदाद पर निग़ाह रखते हैं? ज़्यादातर ज़वाब शायद हाँ में ही होंगे। 

वैसे किसी के पास पैदायशी सैकड़ों एकर हों और किसी के पास कुछ भी नहीं। आप पैदा कहाँ हुए हैं, यही आपकी नियती निर्धारित कर दे, ग़लत तो ये भी है। ऐसे लोगों को भी कुछ तो न्यूनतम मिलना चाहिए। 

बाहरी दखल और सामानांतर केस

जितना ज़्यादा आप सामानांतर केसों का विश्लेषण करेंगे, उतना ही समझ आएगा की अपने आप जैसा कुछ नहीं है। बहुत जगह, बहुत तरह के जबर्दस्ती घड़ने के तरीके हैं। चालाकी और धूर्तता के तरीके हैं। 

जो केस जितना ज्यादा एक जैसा-सा दिखता है, उसमें उतनी ही ज्यादा जबरदस्ती घड़ाई हुई है। जो बाहरी दख़ल के बिना संभव ही नहीं है। जहाँ Campus Crime Cases में इनके प्रमाण Documented हैं। वहीँ सामाजिक घड़ाई में बातों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना। आधी-अधूरी जानकारी देना। इधर का उधर, उधर का इधर करना या बताना। कुछ-कुछ हेराफेरी जैसा-सा ही। हेराफेरी करने के लिए कुछ उपयुक्त परिस्थितियाँ, जैसे:  

जिस जगह मनमुटाव या आपस में फुट ज्यादा होगी। 

विचारों में मदभेदों को स्वीकार करने की सहनशीलता कम होगी।

लोग कान के कच्चे ज्यादा होंगे। 

आपस में बात करने की बजाय, बाहर वालों से ज्यादा बात करते हों। 

या किन्ही केसों में एक दूसरे के बारे में जानकारी किसी और से लेते हों, किसी भी परिस्थिति वस। 

शांत दिमाग की बजाय जल्दी गुस्सा करने लगते हों। 

और भी ऐसी ही कितनी परिस्तिथियाँ हो सकती हैं, जहाँ इन्हे घड़ना आसान हो जाता है । जहाँ फुट या मनमुटाव ना भी हो, या ऊपर दी गयी जैसी कोई परिस्थियाँ न भी हों, वहाँ भी शातिर  लोग जाने कैसी-कैसी परिस्थियाँ पैदा करने का मादा रखते हैं।

आजकल ऐसा ही कुछ आसपास चल रहा है, जिसके परिणाम 2024 तक ही शायद खतरनाक रूप में सामने आ सकते हैं। जो इस घड़ाई के मोहरे बने हुए हैं, उन्हें खुद नहीं मालूम की वो रोबोट्स की तरह प्रयोग हो रहे हैं। उनके अपने लिए इसके परिणाम सही नहीं होंगे।  

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