ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 17

अशोक भाई साहब, आप ईमेल करने वाले थे, “वो प्रॉपर्टी जो आपकी ना है और ना होगी”, जिसको आप कह रहे हैं की हमने खरीद ली है। दो बोतल देकर? घर वालों के विरोध के बावजूद? खासकर, सुनील की बड़ी बहन, विजय के विरोध के बावजूद? सुना है, कानून के अनुसार उस दादालाही जमीन में बहन का भी हिस्सा होता है? उसका उस 5 लाख आगे भी कोई हिसाब किताब बताने वाले थे शायद आप? 

भूल गए लगता है? इसीलिए याद दिलवाया जा रहा है की आगे और ज्यादा भद ना पिटे। सुना है शिक्षक हैं शायद आप? या प्रॉपर्टी डीलर?    

वैसे सुना है, बलदेव सिंह की सड़क के साथ वाली जमीन (अजय दांगी) भी आपने खरीद ली है? सुना है। कितने में? 9-10 लाख में? या उससे आगे भी कोई हिसाब किताब है?

इससे साल, दो साल पहले दादा समन्दर के भी 8-10 किले खरीदे हुए हैं, वो भी गाँव में ही। उसका भी कोई हिसाब होगा? हालाँकि, वो जमीन और ये ज़मीन एक नहीं है। दोनों में ज़मीन और आसमान का फर्क है। 

और भी आपकी कई प्रॉपर्टी यहाँ वहाँ सुनने को मिली हैं, करोड़ों में। एक छोटे से स्कूल से कितनी कमाई हो जाती है? ऐसा कौन सा कारोबार चलाते हैं आप?  स्कूली शिक्षा के नाम पर ज़मीनी या प्रॉपर्टी धँधा?     

ऐसे घपलों को रोकने का एकमात्र उपाय कोई भी या किसी भी तरह का ट्रस्ट हो, वो अपनी प्रॉपर्टी की सारी जानकारी अपने पोर्टल पर उपलभ्ध कराए। अगर किसी को वहाँ जानकारी न मिले, तो कोई भी ऐसी जानकारी उस ट्रस्ट से माँग सकता है। और RTI के तहत उन्हें उपलब्ध करानी पड़ेगी। तो बहुत से घपले तो यहीं ख़त्म हो जाते हैं। आप क्या कहते हैं?

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 16

 धोखाधड़ी और खास तरह का व्यवहार एक ही बात हैं? 

6-7-2025 (श्याम का वक़्त है, टाइम देखा नहीं। शायद, 7.00 PM के करीब)   

अभी आंटी को मिलने आए हैं। इस (ज़मीन) विषय पर फिर कभी बात करेंगे। 

फिर कभी कब? फिर कभी तो मिलते ही नहीं आप। ना स्कूल मिलते और ना घर। वक़्त नहीं होता, इस विषय पर बात करने के लिए। ये क्या बता रहा है। साफ़ यही की धोखाधड़ी है। और भगौड़ा कौन होता है? जिसे पता होता है की उसने गुनाह किया हुआ है और अपने बचाव के लिए उसके पास कुछ खास नहीं है। 

मंजू कल आ जाना स्कूल। 

घर पे आए तो हुए हैं भाभी। यहाँ बात करने में क्या हर्ज है? वैसे भी आंटी ने बोला था की मैंने तो सुना है 30-35 लाख में दी है ज़मीन, 5-6 में नहीं। तो आंटी को भी कुछ तो पता ही होगा, क्यूँकि, अजय इस सबमें बिचौलिया है। 

तू अजय को क्यों बीच में लेती है। जो मुझे पता था वो मैंने बता दिया। 

धन्यवाद आप अभी तक अपनी जुबाँ पर हैं। ये भी बड़ी बात लग रही है, यहाँ के माहौल में। अब ये भी बता दें की घर की घर में ये अच्छी बात हुई है क्या। जो जमीन बेचना ही नहीं चाहते, उस ज़मीन को धोखाधड़ी से लेने की कोशिशें? इतने में नहीं भरा हुआ तो 2-कनाल में भर जाएगा क्या? और अजय का ही किया धरा हुआ है ये। ऊप्पर से किसी खास पार्टी के, कुछ खास लोगों द्वारा, उससे करवाया गया है। 

मंजू तू कल स्कूल आ जाईयो। 

भाभी स्कूल भी आई थी, याद हो तो। क्या हुआ?

अरे हम ही घर आ जाएँगे किसी दिन। 

वो तो सबसे बढ़िया बात है भैया। बताओ कब आ रहे हैं?

वक़्त लगेगा तभी। 

वक़्त लगाना तो अपने हाथ में होता है। जब चाहो लगा लो। ना चाहो तो कभी नहीं लगता। तो मुश्किल ही लग रहा है। 

मंजू तू कल स्कूल आ जाना। 

ठीक है भाभी। कितने बजे?

अरे स्कूल छोड़ो, हम ही घर आ जाएँगे। 

भाभी कह रहे हैं तो स्कूल भी सही है भईया। वो वक़्त तो बता रहे हैं। आपको तो पता ही नहीं, कब वक़्त लगेगा। 

3 बजे ठीक है 

ठीक है 

तुम आराम से बात करो। मुझे सिर दर्द हो रहा है। 

सॉरी आंटी। मैं सिर दर्द करने नहीं आई आपको। ये लोग आते दिखे तो आ गई। क्यूँकि, कहीं और तो मिलते नहीं। और आप अभी तक अपनी जुबाँ पर टिके हुए हैं, उसके लिए धन्यवाद। यहाँ पे ऐसे लोगों की कमी लग रही है मुझे। आज के टाइम में, शायद जुबाँ पे टिकना भी बड़ी बात हो गया है।  

7-7-2025   (2. 00 PM के करीब)

स्कूल चलेगी?

हाँ दीदी चल पड़ूँगी। 

तो थोड़ी देर में चलते हैं। मैं अभी तक नहाई नहीं हूँ। नहा आती हूँ। 

मैं भी नहीं नहाई हूँ दीदी। मैं भी नहा लेती हूँ। 

थोड़ी देर बाद बाथरुम में बाहर से आवाज़ आती है भांजी की। मौसी, मम्मी ने फ़ोन किया था, मामा जी तो स्कूल नहीं हैं। कहीं गए हुए हैं।  

ठीक है। 

मैं नहा के स्कूल की तरफ निकल लेती हूँ। चलो इस बहाने थोड़ा घूम ही आऊँ। जब से मदीना आई हूँ, वॉक तो बंध ही हो गई है। यहाँ खेतों की तरफ जाने के सिवा, कहीं कोई साफ़-सुथरी जगह ही नहीं है। 

स्कूल के रस्ते थोड़ी दूर एक गाडी दिखाई दे रही है। लग तो रहा है, लक्ष्य की है। जब तक दिखाई देता है, गाडी आगे निकल चुकी है। और आप मन ही मन सोचते हैं, तो ये स्कूल में ही था और इसे घर भेझ दिया?

थोड़ी दूर और चलने पर, भराण मोड़ के पास, अशोक भाई और भाभी दिखते हैं, गाडी में। आप धीरे हो जाते हैं। मगर, ये भी निकल जाते हैं, दूसरी तरफ मुँह करके, जैसे दिख ही ना रहा हो। और आप मन ही मन सोचते हैं। शिक्षा और ये व्यवहार? क्या कहलाता है? शिक्षा एक धंधा है? यहाँ कोई जुबाँ, कोई ईमान, कोई Manner या Coutesy नाम की चीज़ ही नहीं है? खैर। ऐसे-ऐसे धोखाधड़ी के मामले तभी होते हैं। वो सब शायद उनके व्यवहार में ही रचा बसा-सा हुआ है। मैं तो घूमने निकली थी। मेरे हिसाब से तो ये स्कूल थे ही नहीं। और मैं स्कूल वाले खेत तक घूमकर, वापस घर आ जाती हूँ।    

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 15

हमारे यहाँ पुलिस ऑफिस, कुछ केसों में एक aknowledgement तक नहीं देते? ऐसे ही अपने आप decide कर लेते हैं, की ये ना तो रजिस्टर करना और ना ही aknowledge? 

शायद aknowledge तो हर complain का बनता है? क्यूँकि, कोई अगर आपके ऑफिस तक कोई समस्या रखता है, तो किसी उम्मीद में ही ईमेल करता होगा? कोर्ट उसके बाद ही आते होंगे शायद? 

खासकर, पियक्क्ड़ों के केस में माँ, बहन, बेटी या घर की औरतों तक की अगर सुनवाई नहीं होगी, तो ऐसी-ऐसी और कैसी-कैसी ज़मीनें तो, so called बड़े या थोड़े से भी पैसे वाले लोग वैसे ही हड़प जाएँगे?   

या शायद मैंने ही किसी गलत ईमेल पर भेझ दिया?

(Some spelling mistakes in this compalin seems कलाकारी by those kalakars, who are doing such things, not just in such complains, but in some other emails also, they change even attachment without senders knowledge. So please bear with this.)    

या बहन को चाहिए नहीं, इसलिए कोई aknowledgement तक नहीं है? बहन को अपना हिस्सा चाहिए, लिखना जरुरी है शायद? तो लिख लो उसे भी। धंधे पर तो नहीं बैठना पड़ेगा ना, उसके लिए? 

इसीलिए लोगों की इतनी औकात हो जाती है, की वो आपसे नहीं, बल्की, उन बेवकूफों से बात करते हैं, जो आसानी से उनके कहे में आ जाएँ? आपसे तो भागते हैं या भगा दिए जाते हैं, खास फ़ोन करके।    

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 14

बड़े दिनों बाद आज आखिर मुलाकात हुई, अशोक भाई से और साथ में उनके परिवार से, चाची को मिलने आए थे। मेरे जैसे तो सिर हो जाते हैं ऐसे ही? खासकर, जब लोग जमीन हड़पकर या ऐसा कोई काम या काँड कर, दूर-दूर भागने लगें? ऐसा ही?

बात तो वो आज भी नहीं करना चाह रहे थे। मगर, किसी की ज़मीन की तरफ गिद्ध निगाह रखकर, भागने से क्या काम चल जाएगा? वो ज़मीन ना आपकी थी, ना है और ना ही होगी। कम से कम मेरे ज़िंदा रहते। तो भाभी की तरह मेरा भी ईलाज कैसे करना है या कहाँ से करवाना है, तो शिक्षा के धंधे वाले लोगों से बेहतर किसे पता होगा? 

ये पोस्ट खास उस जनता के लिए, जो ये ब्लॉग रेगुलर पढ़ रहे हैं। कल को अगर मुझे कुछ होता है, तो उसके पीछे ये (आर्य स्कूल मदीना? या खूनी स्कूल मदीना?) और इनकी खास-म-खास पार्टी होगी। वो पार्टी, जो ना सिर्फ इस पीने वाले भाई की ज़मीन के पीछे है, बल्की चाहती ही नहीं, बल्की, पूरी कोशिश में है की येन केन प्रकारेण दूसरे भाई की ज़मीन भी हड़प लें। इन लोगों के शब्द सुनकर तो ऐसे लगता है, जैसे सब दान करने के लिए बैठे हैं इन्हें।  

यूनिवर्सिटी उसमें लगता है पूरी सहायता कर रही है, मेरा पैसा रोककर। 

You are requested again publically, give me my whole amount without any further delay. As an higher education system, you have already given her so much opportunities to grow personally and professionally that their signs are so evident in her life, body and all around her.                        

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 13

 जुआरियों के धंधे में 

आप वहाँ बैठे हैं 

जहाँ आपका अस्तित्त्व क्षण भर का रहा? 

या सालों, दशकों पहले 

आया गया हुआ? 

आपकी जानकारी के बिना? 

और कहीं-कहीं तो ऐसे कोढ़ो पर, जिन्हें आप नफरत करते हों?  

जितना ज्यादा इस धंधे के कोढों को जानने की कोशिश करोगे, उतना ही इससे नफरत होती जाएगी। और मुझे लगा, ऐसा मैं ही सोच रही हूँ? 

नहीं। जुए पर भी आपको काफी कुछ पढ़ने-सुनने को मिलेगा, यहाँ, वहाँ। कहीं जो शायद आँखें खोल रहा होगा और कहीं उसकी परतों के या बेहुदा सौदों की पोल खोल रहा होगा। और आप सोचने पर मजबूर होगे, की जो-जो इस धंधे में आए, वो कैसे आए होंगे? क्या उन्हें कहीं भी खबर नहीं हुई होगी, की ऐसा करना गलत है? खासकर, शिक्षा के ऊँचें पायदानों पर बैठे लोगों को? शिक्षा के ऊँचें पायदान? भला इतने नीच कैसे हो सकते हैं?

चलो, छुटभैईये तो अक्सर कम पढ़े-लिखे ही होते हैं। और ज्यादातर, सँसाधन-विहिन भी? बड़े लोग? कितने बड़े? कैसे अंदाजा लगाया जाए, उनके बड़पन का? शायद इससे, की ऐसी कुर्सियों पर बैठे लोग, कितना वो काम कर रहे हैं, जिसके लिए उन्हें वहाँ बिठाया गया है? और कितना, कोढ़ के जुए की किसी पार्टी का?   

सँस्कार? 

आदमियों को मारना सँस्कार में आता है, जुए के धंधे में? छुपे, गुप्त तरीके से गोलियाँ या जहर देना, वो भी सँस्कारी लोग ही करते होंगे? अब नामों का क्या है, वो तो किसी का भी लगाया जा सकता है? कौन, कहाँ, भला कौन से फॉरेंसिक करने आएगा? और किसी के जाने के बाद, उस इंसान के लिए किसी फॉरेंसिक का मतलब क्या रह जाएगा?     

लड़कियों को प्रॉपर्टी बोलना, या लड़कियों के नाम पर बनाए गए कोढों के नाम पर उनका धँधा करना, सँस्कारी होने की पहचान है? ऐसे-ऐसे कितने सँस्कार, कहाँ-कहाँ और किन-किन बहन-बेटियों के नाम पे किए हुए हैं तुमने? कल भी किए और आज भी कर रहे हो। सच में, कितने सँस्कारी हो तुम? फिर ऐसा कुछ इतना खुलम-खुल्ला लिखने या बोलने वाला का तो हाल क्या करोगे? सोचा जा सकता है?   

अंजान, कम पढ़े-लिखे और गरीबों को तो कितनी ही आसानी से कहीं से कहीं धकेला जा सकता है। तुम तो पढ़े- लिखों तक को नहीं बक्शते? कुछ गलत कहा क्या? 

जिन लड़कियों के नाम पर तुम कोढ़म-कोढ़ ज़मीनो के सौदे करते हो, बड़ी ही बेशर्मी से, अपने धेले के सँस्कारों के साथ, क्या उन लड़कियों से पूछते हो? उनकी औकात होती है कोई, तुम्हारे इस जमीनखोरी के जुआर धँधे में? 

या वो किन्हीं और ही सँस्कारों के बहाने मार दी जाती हैं? ऐसे भी और वैसे भी?    

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 12

 गुंडे जो जबरदस्ती दूसरों के घरों में घुसें?

औकात है?

गुंडे जो जबरदस्ती या धोखाधड़ी से अर्थियों के ढेर लगाएँ?

औकात है?

गुंडे जो जबरदस्ती या धोखाधड़ी से,

दूसरों की जमीनों को हड़पने की कोशिश करें?   

औकात है?  

बड़ी औकात कांता भाभी तेरी?

या तेरे गुंडे की? ओह ! भतीजे। 

2-कनाल के लिए कितनी और अर्थियाँ उठाओगे?

भाभी को तो खा गए। 

जबरदस्ती या धोखाधड़ी से?

सुना है, स्कूल खोलने वाली थी वो अपना?

उसी ज़मीन पर?

जिस पर तुम्हारी गिद्ध-सी निगाहें,

कब से टिकी हैं? 

सुना है,

उसके बाद ये बहन 

वहीँ अपनी कोई छोटी-मोटी, पढ़ने-लिखने लायक 

झोपड़-पट्टी बनाने वाली थी?

क्या हुआ उसका?

भतीजे को बेचारे को, शायद नहीं पता 

की उस झोपड़-पट्टी की ऑफिसियल ईमेल तो 

और भी पहले चल चुकी। 

बहन, बेटियों को और कैसे-कैसे खंडहरों वाली 

जेलों में रखोगे?

जहाँ-जहाँ चलेगी तुम्हारी?

और तुम?

कब तक उनके अपनी कमाई के पैसे रोककर,

कोशिश में रहोगे, की वो तुम्हारी गुलामी में नौकरी करें?

चाहे वो तुम्हें धेला पसंद ना करती हों। 

कैसे भाई-बंध, भतीजे या चाचे-ताऊ या दादे हो तुम? 

किन कंसों, शकुनियों या रावणों के प्रतिनिधि?

या और कैसे-कैसे राक्षसराजों की कर्तियाँ?     

जबरदस्ती की औकात और भगोड़ा होना?

एक ही होता है क्या?

इतना सुनने के बाद तो, कोई भी इज्जत वाला पीछे हट जाए?

पर शिक्षा का धंधा करने वाले?

2 कनाल के लिए?

नहीं, नहीं, इरादा तो सबकुछ हड़पने का था। 

वो हो नहीं पाया?    

तो चालें और धोखाधड़ी का धंधा जारी है। 

बेटा, आज फिर सुना है, तेरा फोन बंध है?  

क्या कर रहा है, उस ज़मीन पर तू?  

उस ज़मीन से पीछे हटने के सिवा, तेरे पास रस्ता है क्या?

बहुत होंगे शायद? 

1 साल हो गया या 2?

वो दो बोतल देके फोटो करवाने का?

उस बोतल वालों के घर के विरोध के बावजूद। 

बुआ के मैसेज कब-सी गए थे?

चाचे, भतीजे के पास?

आजकल में?

या उसी के आसपास? 

तब से भगोड़े ही हो शायद? 

कैसे-कैसे काम करते हो?

की भगोड़ा होना पड़े?   

कितना और गिरोगे?

शिक्षा के धंधे में?

2 कनाल के लिए?

सिर्फ 2 कनाल का लालच?

इतने अमीर लोगों के लिए?

कौन जगह है वो, जहाँ मिलती है ऐसी जमीन?

5-6 लाख में?  

या 30-35 लाख में?

कैसे-कैसे लालच देकर 

कैसा-कैसा रुंगा बाँटते हो?

वो भी अपनों को ही?   

ऐसे गंदे धंधे करने की बजाय, 

बेहतर ना हो, की दिमाग कहीं ढंग की जगह लगाओ। 

सुना है, किसी का यूनिवर्सिटी का पैसा आज तक रोकने की भी, बस इतनी-सी ही कहानी है? ये तार आपस में मिले हुए हैं? सुना है। हालाँकि, अपनी समझ से आज तक परे है। 

लोगों को और उनके संसाधनों पर काबू और कब्जे  करने की कोशिशें और कहानियाँ। जो मिलती, जुलती-सी लगेंगी, यहाँ भी, वहाँ भी और वहाँ भी। मगर ध्यान से देखने, पढ़ने लगोगे, तो कुछ नहीं मिलता, मकड़ी-से जालों के सिवाय। 

हमारे जैसे सोचते हैं, घर-कुन्बे की बात है, ऐसे ही निपट जाए। मगर, कुछ लोगों को शायद, मजा नहीं आता ऐसे?        

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 11

 शिक्षा और राजनीती का क्या लेना-देना है, इस केस में?

राजनीती का तो सारा ही है। समाज की सब समस्याओं की जड़ है राजनीती। हालाँकि, समाधान भी वहीं हैं। मगर राजनीतिक रस्तों से अगर समाधान निकालने की कोशिश करोगे, तो शायद आपकी ज़िन्दगी ही नहीं, आपकी कई पीढ़ियों की ज़िंदगियाँ खप जाएँ। 

कोर्ट्स का भी कुछ-कुछ ऐसे ही है। कई केसों में तो कोर्ट्स भी लल्लू-पंजू से नजर आते हैं। ऐसा क्यों? ये शायद खुद कोर्ट्स बता पाएँ? कोर्ट्स इस सिस्टम में खुद एक कोढ़ (कोड) हैं।

इंसान, अच्छे-बुरे हर जगह और हर प्रॉफेशन में हैं। कितनी, कब, कहाँ और किसकी चलती है, ये  अहमियत रखता है, शायद। नहीं तो कितना कुछ कोर्ट्स तक, अपने सामने होते हुए भी, बेचारे से, लाचार से देखते हैं? जैसे उनके पास कोई रस्ता ही ना हो? खैर। शिक्षा का भी कुछ-कुछ ऐसे ही है। ये ज़मीनखोरी का एक छोटा-सा, तकरीबन-तकरीबन उसी वक़्त दिखाया-बताया जा रहा उदहारण है। जहाँ गाँव का कोई छोटा-सा स्कूल, कैसे किसी सामान्तर घड़ाई का हिस्सा बन, अपने ही चाचा, ताऊओं के बच्चों पर मार कर रहा है? 

यूनिवर्सिटी की फाइल्स या इमेल्स और गाँव के स्कूल वालों की घड़ाई? है ना मजेदार? 

वैसे मेरी यूनिवर्सिटी की बचत का अभी क्या चल रहा है?

भाभी की मौत के बाद, मैंने अपने नॉमिनी बदलवाने के ईमेल की। मगर हुआ कुछ नहीं। बल्की, इधर-उधर से चेतावनियाँ आनी लगी, की ऐसा मत करो। ऐसा हुआ तो, तीनों बहन-भाईयों को साफ़ करने की साज़िश है। और ऐसे लोगों के लिए, फिर गुड़िया को औना-पौना करना कितना मुश्किल होगा? समझ ही नहीं आ रहा था की क्या, कहाँ और कितना सच था। मगर मुझे भी लगा, वैसे भी जब इस घर में बच्चा ही एक है, तो अभी तो सब उसी का है। अगर तीनों बहन-भाईयों को ख़त्म करने जैसी कोई साज़िश चल रही है, तो भी उसी का है। मगर ऐसे में, वो भी कितना सुरक्षित होगी? और मैंने कुछ नहीं किया, जो पहले से नॉमिनी थे, वही रहे। ना ही यूनिवर्सिटी ने ईमेल के बावजूद बदले। बचत दो पर ईमेल होती रही। 

एक दिन यूनिवर्सिटी ने उसके लिए भी बुलाया। उसकी पोस्ट मैं पहले लिख चुकी शायद, की कुछ अजीब-सा चल रहा था। मेरे कहने के बावजूद, मेरे घर का पता नहीं बदला गया। मैंने सारे पैसे एक साथ देने को बोला, तो उन्होंने कहा की ऑप्शन ही नहीं है। 

जबकी कहीं और, ये ऑप्शन, मैंने पढ़ी और सुनी थी। 

कहने को मैं sign कर आई, मगर साथ में concerned official को ईमेल भी कर दी, जो कुछ वहाँ हुआ या मुझे समझ आया, उसके बारे में। तो अगर वो पता तक अपडेट नहीं कर रहे, तो उन sign के भी क्या मायने हैं?

आप कूट, पीट, लूटकर निकाल चुके हैं। तो छोटी-मोटी बचत तो शायद सारी दे ही देनी चाहिए। 

अब NSDL या Protean के नाम पर फ्रॉड इमेल्स के ड्रामे शुरु हो चुके थे। समझ ही ना आए, की कौन-सी ईमेल कहाँ-से है? या NSDL की कितनी ऑफिसियल वेबसाइट या ईमेल Id हैं? 

वहाँ भी ईमेल में जवाब यही था, की मुझे मेरा सारा पैसा दे दो। ताकी यहाँ अपना कुछ बंदोबस्त कर, आगे कुछ किया जाय। इस बीच जमीनखोर लोग, अगर फिर से कुछ खुरापात कर रहे हैं, तो इसका मतलब क्या है? क्यूँकि, यूनिवर्सिटी और गाँव में आसपास काफी कुछ कोआर्डिनेशन में चलता है।   

और ये लड़कियों के हकों पर राजनीती करने वालों के लिए भी। किसी की ज़मीन को यूँ, इतनी टिक्कड़बाज़ियों से, किसी प्राइवेट स्कूल की तरफ खिसकाना, क्या कहलाता है? सिर्फ माँ गई है बच्ची की। बुआ, बेटी दोनों घर बैठी हैं। और हाँ। एक और बुजुर्ग औरत भी है इस घर में, दादी। तो यहाँ शायद, कोर्ट्स भी बेचारे और लाचार ना हों? 

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 10

स्कूल और दो कनाल ज़मीन (Protection?)

(ये पोस्ट दिसंबर 2024 की है, जब ये सब चल रहा था तभी की) 

सुना है उसकी जान को खतरा है? शराब से? या दो कनाल से? या किसी और चीज से?

जिन्हें राजनीतिक जुए की मार आम लोगों पे कैसे-कैसे होती है, को जानना हो, वो इस शराब लत वाले इंसान पे फोकस कर सकते हैं। बहुत-सी मौतों के राज समझ आएंगे और तारीखों के भी। वो शराबी नहीं है, उसे शराबी सिस्टम की जरुरतों या कहो पार्टीयों की जरुरतों ने बनाया है। थोड़ा ज्यादा हो रहा है ना? और उसपे मैं ये कहूं की ये ज्यादातर आम-आदमियों पे लागू होता है। सिस्टम। 

बड़े लोग सिस्टम को बनाते हैं, अपनी जरुरतों के अनुसार। और आम-आदमी बनता है, उनकी जरुरतों का मोहरा, गोटी। इनमें वो भी हो सकते हैं, जो आज इस सिस्टम की या किसी एक पार्टी की जरुरत के अनुसार, इस सामाजिक सामान्तर घड़ाई का हिस्सा बन चुके हैं। जिस किसी वजह से। अगर आप गाँव के किसी स्कूल से सम्बंधित है, तो थोड़ा बहुत पैसा और ठीक-ठाक ज़िंदगी होते हुए भी, सामाजिक सँरचना के पिरामिड में आखिर वाले पायदान पे ही हैं। गाँव आज भी पिरामिड का वही हिस्सा हैं। हाँ। उस गाँव वाले पिरामिड में हो सकता है, स्तिथि थोड़ी-सी सही हो।        

सिस्टम एक पिरामिड है। इस पिरामिड के तीन अहम हिस्से हैं।  

उत्पादक (Producers) : पैदा करने वाला, जैसे खाना, कपड़ा और मकान। और भी कितनी ही तरह के उत्पाद, जो इंसान प्रयोग करता है।           

उपभोगता (Consumers) : प्रयोग करने वाला  

सफाई कर्मी (Decomposers) : साफ़-सफाई करने वाले, किसी भी तरह की 

जहाँ इन तीन हिस्सों में संतुलन है, वो घर, परिवार या समाज संतुलित है। वो इंसान संतुलित है। जहाँ इनमें से किसी एक में भी कहीं कुछ गड़बड़ है या असंतुलन है, वो समाज असंतुलित है। वो सिस्टम असंतुलित है। वो घर, परिवार,  इंसान असंतुलित है।   

स्कूल और दो कनाल ज़मीन का इस सबसे क्या लेना-देना? 

सामाजिक सामान्तर घड़ाई 

चलो एक दारु-लत वाले इंसान की कहानी सुनते हैं । सुना है उसकी जान को खतरा है? शराब से? या दो कनाल से? या किसी और चीज से? 

शायद इसीलिए, भतीजे ने (दूसरे दादा के बच्चे, रोशनी बुआ वाला घर), वो ज़मीन खरीद ली? क्यूँकि, उसने खुद ऐसा बोला की बुआ Protection के लिए ली है। हम नहीं लेते, तो कोई और लेता। किसके और कैसे Protection के लिए? ये समझ नहीं आया बुआ को। ये शराब दो और ज़मीन लो के गाँवों में ही इतने किस्से क्यों मिलते हैं?    

सबसे बड़ी बात, क्या वो ज़मीन बिकाऊ थी? सुना, कुछ वक़्त पहले तो वहाँ स्कूल बनने वाला था। भाभी के जाने के बाद, शायद कोई छोटी-मोटी रहने लायक जगह या कुछ ऐसा-सा ही। बुआ को हमेशा के लिए गाँव रहना नहीं, तो किसके काम आता वो? अरे वो तो पैसा यूनिवर्सिटी ने रोक रखा है ना? वैसे यूनिवर्सिटी की उस छोटी-मोटी बचत में, मैं अपने नॉमिनी बदलने की रिक्वेस्ट भी दे चुकी, काफी पहले। मगर, जाने क्यों आज तक यूनिवर्सिटी ने ना वो नॉमिनी बदले और ना ही मुझे अभी तक वो पैसा दिया। जाने क्या-क्या होता है दुनियाँ में? और क्यों होता है? क्या इसीलिए, की ये थोड़ी-सी किसी भाई की, खास जगह वाली ज़मीन बिकवाई जा सके? क्यूँकि, अब जो नॉमिनी में नाम हैं, उनमें एक ये है, जिसकी ज़मीन बिकवाई गई है। और दूसरा नाम भतीजी। माँ और छोटे भाई का हटा दिया, क्यूँकि उन्होंने कहा की उन्हें जरुरत नहीं है। इस भाई का जैसे अपहरण किया हुआ है और बोतल सप्लाई हो रही हैं। उस हिसाब से तो जल्दी ही खा जाएँगे इसे। या इसीलिए कुछ अपने कहे जाने वाले लोग, किसी गरीब का फायदा उठा रहे हैं? बहन तो कोई सहायता कर नहीं सकती, इस हाल में? बचा कौन? माँ तो वैसे ही आई-गई के बराबर है? भाई क्यों और कब तक भुगतेगा, ऐसे इंसान को?          

वैसे घर पे माँ-बहन को तो जरुर बताया होगा, ये जमीन खरीदने वाले अपनों ने? क्यूँकि, वो माँ के पास घर आता-जाता था और खाना भी वहीं खाता था। कुछ होता तो हॉस्पिटल बहन लेके जाती थी। दो बार तो शराब के नशे की वजह से एडमिट भी हो चुका और deaddiction सेंटर भी जा चुका। ये अजीबोगरीब किस्से-कहानियाँ कैसे और कहाँ-कहाँ जुड़े हैं, ये किन्हीं और पोस्ट में। अगर नहीं संभाला गया होता, तो कितने ही उसके आसपास वालों की तरह, राम-नाम-सत्य हो चुका होता।  

मगर जबसे ये ज़मीन के चर्चे शुरू हुए, खासकर भाभी के जाने के बाद, तबसे कुछ और भी खास चल रहा है। बंदा जैसे अपहरण हो रखा हो। कई-कई दिन फ़ोन बंद। उठाए तो टूल। बहन तो अब तक deaddiction centre भेझ चुकी होती, ऐसे हाल में। मगर, अबकी बार कुछ गड़बड़ है शायद? उसे शराब से दूर और पोस्टिक खाने की खास जरुरत है। मगर कहाँ का खाना, जब शराब देके सब निपट जाए?   

लगता है Protection के लिए काफी पैसे दे दिए? शराब पीने वाले को पैसा? उसे बचाने के लिए या उसका राम-नाम सत्य करने के लिए? अरे नहीं, पैसे उसे नहीं दिए। सिर्फ कोर्ट के जमीन वाले पेपर्स पे ऐसा लिखा है। 1 लाख सामने ही एक पड़ौसी हैं, उन्हें दिए हुए हैं। इन्हीं पडोसी ने बताया, की उन्हीं में से थोड़े-बहुत ले लेता है। 1.5 लाख और कहीं बताए, उस पड़ोस वाले भाई चारे ने। घर वालों से क्या खतरा था, उन्हें क्यों नहीं? अगर ये भी मान लें, की माँ या भाई ने बोलना ही छोड़ दिया है उससे, तो बहन के बारे में क्या कहेंगे? सबसे बड़ी बात, बहन जमीन खरीदने वालों के घर तक गई, जब सामने आया की ऐसा कुछ चल रहा है, या हो चुका। अपना समझ के, की ये मामला क्या है? और खरीदने वाले की माँ बोले, हमें तो खबर ही नहीं? लगता है स्कूल प्रधान चाचा को भी, अब तक भी खबर नहीं हुई? बाकी फोन उठाना या मेसेजेस का जवाब देना, शायद उसके संस्कारों में नहीं। कितने संस्कारी लोग हैं?         

विपरीत परिस्तिथियों का फायदा उठाओ और हालात के मारे को और जल्दी ऊपर पहुंचाओं? बहुत-सी बातों और हादसों पर यकीन नहीं होता। ऐसे, जैसे ज़मीन के पेपर आपके पास आ चुके हों। बेचने, खरीदने वाले और गवाहों के फोटो और अजीबोगरीब-सा, पैसे का हिसाब-किताब भी। ज़मीन, वो भी उस जगह, सच में इतनी सस्ती है? कोड़ी के भाव जैसे। कुछ वक़्त पहले, मैं खुद ज़मीन ढूढ़ रही थी, यहीं आसपास। मुझे तो इतनी सस्ती ज़मीन, कहीं सुनने को भी नहीं मिली। ये स्कूल वाले देंगे इतने में? खुद इन्होंने अभी पीछे काफी किले खरीदे हैं, कितने में? वो भी पानी भरने वाली बेकार-सी ज़मीन। इस ज़मीन के साथ वाली ज़मीन नहीं। शायद इसीलिए, माँ-बहन से बात तक नहीं करना चाहते?      

उसपे ये गवाह कौन हैं? क्या खास है उनमें? घर या आसपास से ही कोई इंसान क्यों नहीं? घर वालों के क्या आपस में जूत बजे हुए हैं? या वो देने नहीं देते? जिसकी बहन कल तक खुद ज़मीन देख रही थी, वहीं आसपास, वो वहीं की ज़मीन क्यों बेंचेंगे? मतलब, धोखाधड़ी का मामला है?

कोर्ट्स को शायद इतना-सा तो कर ही देना चाहिए की किसी को कोई आपत्ति है या नहीं, जैसा एक नोटिस, कम से कम पुस्तैनी ज़मीनो के केसों में घर तक पहुँचवा दें, अगर ज़मीन किसी के नाम हो तो भी। अगर ऐसा हो जाए, तो कितनी ही औरतें या परिवार वाले, बेवजह के कोर्ट्स के धक्कों से बच जाएँ। हमारे इन रूढ़िवादी इलाकों में हक़ होते हुए भी, पुस्तैनी जमीनों को ज्यादातर आज भी, माँ, बहनें नहीं लेती। मगर इसका अर्थ ये भी नहीं होता, की कोई भी ऐरा-गैरा, नथू-खैरा या जालसाज़ उन्हें धोखे से अपने नाम कर ले। कोई इंसान पिछले कई सालों से दारु की लत से झूझ रहा हो, तो उसका मानसिक संतुलन सही है या नहीं, ये सर्टिफिकेट कौन देगा? वो जो सालों से उसे झेल रहें हैं, और बचाने की कोशिश कर रहे हैं? या वो, जिनकी निगाह, उसकी ज़मीन पे हैं? और ऐसे लोगों को ये ज़मीनों के खरीददार, पैसे भी देते होंगे? कुछ बोतल ही काफी नहीं होंगी? उसकी कहानी किसी और पोस्ट में। क्यूँकि, ऐसी कई कहानियाँ आसपास से सामने आई।      

अपने ही आदमी हैं? घर कुनबा है? इसीलिए, पब्लिक नोटिस लगाना पड़ रहा है, की किसी सुनील की कोई ज़मीन ना बिकाऊ थी, ना है। शराब लत वाले इंसान को बोतल देके, ज़मीन लेने की कोशिश ना करें। और अगर ये पेपर सच हैं, जो मेरे पास थोड़ा लेट पहुँचे हैं शायद, तो इसका साफ़-साफ़ मतलब ये है, की खरीदने वाला भगोड़ा इसीलिए हो रखा है की धोखाधड़ी है। वरना, मैसेज करो तो जवाब नहीं और घर जाओ तो गुल हो जाता है, भतीजा। 

सामाजिक सामान्तर घड़ाई मुबारक हो। आखिर इस पीढ़ी का नंबर भी तो, कहीं न कहीं से तो शुरू होना ही था? कितना बढ़िया हुआ है ना? अच्छा लग रहा है? बेहतर होता, अपने आसपास की सामाजिक सामान्तर घड़ाइयों से सीख लेके, ऐसे ओछे गुनाह से बचते। अगर शराबी चाचा की सच में कोई फ़िक्र होती, तो उसके वो हाल ना होते, जो हो रखे हैं। वो आजकल है कहाँ और रहता कहाँ है, या खाना वगैरह कहाँ खाता है, ये तो अता-पता जरूर होगा? भगोड़ा होने की बजाय, बेहतर होगा की बुआ से संपर्क करें।      

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 9

कोई अपना शायद ऐसा ही सोचेगा? और ऐसा ही कुछ करने की कोशिश करेगा?

थोड़े कम पढ़े लिखे और बेरोजगार लोग, अगर अपना कुछ पढ़ाई-लिखाई से सम्बंधित शुरु करेंगे, तो ना सिर्फ साफ़-सुथरे, बने-ठने, साफ़-सुथरी जगह रहेंगे। बल्की, अच्छा बोलेंगे और कुछ न कुछ रोज नया सीखेंगे। राजनीती के दुरुपयोग करने वालों से या जालों से थोड़ा-बहुत बचेंगे। और क्या पता, चल ही निकलें। क्यूँकि, ज़िंदगी में इतना कुछ झेलने के बाद, शायद, थोड़ी-बहुत तो कुछ करने की इच्छा जाग ही जाती होगी? बशर्ते, ऐसा भला चाहने वालों के बीच रहें? 

और नाश उठाने वाले? 

ऐसे लोगों की कोई सहायता करनी तो दूर, जो थोड़ा-बहुत भी उनके पास होगा, उसे भी छीनने या ख़त्म करने की कोशिश करेंगे?

क्या चाचे-ताऊ भी ऐसा कुछ करते हैं?

दिसंबर 2024, 15 या 16?  

अजय आता है और बताता है, की लक्ष्य ने कल सुनील की ज़मीन ले ली। 

ले ली? या तेरा भी बीच में कोई लेना-देना है? ऐसे कैसे ले ली?

अशोक दांगी को फ़ोन जाता है, मगर उठाया ही नहीं जाता। कई कॉल जाती हैं, पर कोई उत्तर नहीं। चलो, व्यस्त होंगे। 

उसके बाद लक्ष्य दांगी की माँ कान्ता को फ़ोन जाता है और बोलते हैं, की मुझे तो ऐसा कुछ पता ही नहीं। पुछूंगी, लक्ष्य से। 

अगले दिन उनके घर जाकर मैं भी मिलती हूँ। मगर, कान्ता भाभी की जुबाँ कभी कुछ बोलती है, तो कभी कुछ। मतलब, सब पता है, और शायद साथ में शय भी दी हुई है।         

खैर। जब लोगों के असली रंग समझ आने लगते हैं, तो उन्हें साफ़-साफ़ बता भी दिया जाता है, की इसे धोखाधड़ी बोलते हैं। 

ऐसा ही कुछ अशोक दांगी और लक्ष्य दांगी के FB पर मैसेज भी होता है। 

उसी की कॉपी 

उन दिनों सुनील महाराज तो घर ही नहीं आ रहे थे। 

मैं प्लॉट गई देखने, तो बेचारे के ये हाल थे। 

बेचारे को ना चाल आ रही थी और पड़े-पड़े जो बक रहा था, वो तो क्या कहने?

ऐसे लोगों से, घर वालों की नाराजगी के बावज़ूद, कैसे अपने ज़मीन लेते होंगे?  

और वो ऐसे हाल में उसे पैसे भी देते होंगे?

मारने के लिए?

चल, जल्दी ख़िसक? 

या ऐसे लोगों की कॉपी भी कोई और ही सँभालते हैं?  

ज़मीनखोरों के ज़मीनी धंधे, शिक्षा और राजनीती के नाम पर 8

 फोटुओं की कहानी, बड़ी अजीब होती हैं वैसे?

ये भी यहीं आकर पता चला। आसपास सुने, किस्से-कहानी। 

बला, फलाना-धमकाना मोबाइल में फलाना-धमकाना की फोटू लिए हांड्य सै। सुथरी, पढ़ी-लिखी छोरी की फोटू लागय सै, अर न्यूं कह सै अंडी, या तेरी होण आली भाभी। 

अर छोरी किहअ और की अ लेहें बताई। भाई यो साँग के सै? 

बला जी इसे-इसे तो नरे साँग सैं।  

किसे का कितय इंटरेस्ट, अर किसे का कितय। 

अब ये इंटरेस्ट, घर बनाने के लिए माँगे गए लोन पर है?

या लोन ले लो, लोन ले लो, पर्सनल लोन ले लो। अरे मैडम, लोन ले लो। कह कहकर, दिए गए one click पर्सनल लोन पर है? 

घर के लिए लोन के लिए अप्लाई करना? और उसकी मोटी-सी फाइल बनवाकर, कई दिन धक्के खिलाकर, लोन ना देना? SBI, MDU  

मगर, उसी बैंक द्वारा, कोई खामखाँ-सी app बनाकर, one click लोन, जबरदस्ती पीछे पड़कर देना? मैसेज पे मैसेज भेझकर। SBI, YONO App 

क्या कहलाता है ये?   

ये सब कहीं और मिलता-जुलता है क्या? 

Conflict of Interest की राजनीती? बला जी, इनकी चाल जा तै भाई, भतीजां नै खसम बना दें। अर बाहण, बेटियाँ नै लुगाई। लिचड़ान की, बेहुदा सुरँग बताई ये तो। और इन सुरँगों के तरीके? ऐसी जोर आजमाईश के?

भाई इस ज़मीन प किमैं ना बनाइये, बाहण नै तै कती नहीं बणाण दिए। कैंसर हो ज्या गा भाई। बयाह ना होवै फेर। या किसे का होरा हो तो? बालक ना होवैं। 

चाचे, ताउवां नै दे दो वाह ए ज़मीन? अर थाम उनके जाड़े पाड़ते हांडो फेर? ना कोय बीमारी हॉवे अर घर भी बढ़िया बसैंगे?  

कैसे-कैसे फद्दू खिंच सकते हैं ये, भोले लोगों का? और कैसे-कैसे तरीकों से एक दूसरे से भिड़ाने की कोशिश कर सकते हैं? सिर्फ ज़मीन का कोई टुकड़ा हड़पने के लिए? Conflict of Interest की राजनीती, ऐसे ही खेलती है, आम लोगों से? और कब से खेलती आई है? यहाँ पे जितना देखो, समझोगे, उतना भेझा खराब होगा। की फद्दू बनाने की कोई सीमा है?